घुसपैठियों के समर्थकों का उजागर होता काला सच

The dark truth about the supporters of the infiltrators is exposed.
 
घुसपैठियों के समर्थकों का उजागर होता काला सच

(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)

किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा उसकी मजबूत सीमाओं, नागरिकों की स्पष्ट पहचान और सभी पर समान रूप से लागू मजबूत कानूनों पर निर्भर करती है। जब तक ये तीनों स्तंभ सुदृढ़ न हों, तब तक देश अपने भू-भाग और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। दुर्भाग्य यह है कि भारत में वोट बैंक की राजनीति के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा अक्सर अधूरा रह जाता है।

आज स्थिति यह है कि देश के अनेक शहरों और विशेषकर सीमावर्ती राज्यों में अवैध घुसपैठियों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। ये लोग फर्जी आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्र बनवाकर भारतीय जनसंख्या में घुल-मिल रहे हैं। दुखद पहलू यह है कि कुछ राजनीतिक दलों की जड़ें ही इन अवैध घुसपैठियों पर आधारित राजनीति से पोषित होती हैं।

एसआईआर ने खोला कई ताकतों का सच

यदि वास्तविकता ऐसी न होती, तो पश्चिम बंगाल में एसआईआर लागू होने के बाद घुसपैठियों की बस्तियों के खाली होने की खबरें सामने नहीं आतीं। इस प्रक्रिया ने उन ताकतों का चेहरा बेनकाब किया है जो राजनीतिक कारणों से अवैध निवासियों को संरक्षण देते रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि “शरणार्थी” एक वैधानिक शब्द है, जिसे तय सरकारी प्राधिकरण द्वारा ही स्वीकृत किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति के पास कोई कानूनी दर्जा नहीं है और वह अवैध रूप से देश में घुसा है, तो उसे संरक्षण देना सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।रोहिंग्या या अन्य समूह जब सुरंगों के रास्ते या सीमाओं पर लगी बाड़ पार कर भारत में अवैध रूप से प्रवेश करते हैं, तो क्या उनका स्वागत सम्मानपूर्वक किया जाना चाहिए? यह स्वयं में एक बड़ा प्रश्न है।

भारत धर्मशाला नहीं – कानून का राज आवश्यक

अब वह समय आ गया है जब भारत को धर्मशाला समझकर रहने वाले ऐसे अवैध लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई अनिवार्य हो चुकी है। देश पहले से ही कई आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में अपने ही नागरिकों की मूलभूत जरूरतें पूरी करना कठिन है। यदि रोहिंग्या या बांग्लादेशी घुसपैठिए देश की नागरिक सुविधाओं पर दावा करने लगें, तो यह स्वाभाविक रूप से भारतीय नागरिकों के अधिकारों का हनन होगा।

देश का आम नागरिक इस सच्चाई को समझता है। लेकिन विडंबना यह है कि घुसपैठियों को आधार बनाकर राजनीति करने वाले कुछ लोग मतदाताओं की सही पहचान सुनिश्चित करने के प्रयासों का विरोध करते हैं। कभी मानवाधिकार के नाम पर, तो कभी नागरिक अधिकार दिलाने की दलील देकर अवैध निवासियों को संरक्षण देने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए हानिकारक है।इस गलत परंपरा पर रोक लगाना अब अनिवार्य हो गया है।

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