वैश्विक बाजार में बढ़ रही भारत के मखाने की मांग, सुपरफूड के रूप में बनी नई पहचान
(ओ.पी. पाल – विभूति फीचर्स)
कभी व्रत-उपवास और पारंपरिक भारतीय खान-पान तक सीमित रहने वाला मखाना अब देश की सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। पोषण से भरपूर होने और हेल्दी स्नैक के रूप में बढ़ती लोकप्रियता के चलते मखाना आज दुनिया के कई देशों में प्रीमियम फूड प्रोडक्ट के तौर पर देखा जा रहा है। भारत इस क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख उत्पादकों में शामिल है और मखाने की बढ़ती मांग ने किसानों, प्रसंस्करण उद्योग तथा निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।
बदलती जीवनशैली के बीच लोग कम कैलोरी और पौष्टिक स्नैक्स की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इसी बदलाव का फायदा मखाने को मिल रहा है। सादा मखाना हो या अलग-अलग स्वादों में तैयार किया गया फ्लेवर्ड मखाना, बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
सरकारी पहल से मखाना क्षेत्र को मिला नया आधार
मखाने की खेती और इससे जुड़े उद्योग को संगठित स्वरूप देने के लिए केंद्र सरकार की ओर से कई पहल की गई हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मखाना क्षेत्र को बढ़ावा देने का उद्देश्य खेती से लेकर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है।
नीतिगत सहयोग के साथ अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, आधुनिक कृषि तकनीक, मशीनों के इस्तेमाल और किसान उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। इससे छोटे और सीमांत किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की संभावना बढ़ी है।
मिथिला क्षेत्र के मखाने को मिला जीआई टैग भी इस उत्पाद की पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे क्षेत्र विशेष में उत्पादित मखाने की प्रामाणिकता और ब्रांड वैल्यू को बढ़ावा मिलता है तथा नकली नाम से बिक्री पर अंकुश लगाने में मदद मिलती है।
बिहार बना मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र
भारत के मखाना उत्पादन में बिहार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तर और पूर्वी बिहार के कोसी तथा मिथिला क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मखाने की खेती की जाती है। सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, दरभंगा, मधुबनी, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिले इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में शामिल हैं।
मखाने की खेती केवल कृषि उत्पादन का विषय नहीं है, बल्कि इससे बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से मखाने की खेती और प्रसंस्करण से जुड़े समुदायों के पारंपरिक अनुभव को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
उत्पादन में तेजी से बढ़ोतरी
हाल के वर्षों में देश में मखाना उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत में मखाने का उत्पादन करीब 63,910 मीट्रिक टन रहा। वहीं 2025-26 में उत्पादन लगभग 80,590 मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
उत्पादन बढ़ाने के साथ उत्पादकता में सुधार पर भी जोर दिया जा रहा है। आधुनिक मशीनों और बेहतर तकनीक के इस्तेमाल से खेती तथा मखाने के प्रसंस्करण में लगने वाली मेहनत को कम करने की दिशा में प्रयास जारी हैं।
दरभंगा स्थित मखाना अनुसंधान से जुड़े संस्थानों की भूमिका भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। पारंपरिक तरीकों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर किसानों की लागत और श्रम कम करने के लिए नए उपकरणों तथा तकनीकों पर काम किया जा रहा है।
निर्यात बाजार में भी बढ़ी पहुंच
भारत के मखाने की मांग अब अमेरिका, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और नेपाल सहित कई देशों में है। हेल्दी स्नैक के रूप में इसकी बढ़ती स्वीकार्यता ने निर्यातकों के लिए बाजार का दायरा बढ़ाया है।
मखाने के निर्यात से जुड़े आंकड़ों को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। पॉप्ड मखाने के लिए अलग एचएसएन कोड उपलब्ध होने से इसके व्यापार और निर्यात के आंकड़ों की निगरानी पहले की तुलना में बेहतर हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग-अलग देशों में मखाने की कीमत और मांग में अंतर है। ऐसे में भारतीय निर्यातकों के सामने केवल उत्पादन बढ़ाने की ही नहीं, बल्कि नए बाजार तलाशने, गुणवत्ता बनाए रखने और बेहतर पैकेजिंग व ब्रांडिंग की भी चुनौती है।
फ्लेवर्ड मखाने ने युवाओं को जोड़ा
घरेलू बाजार में भी मखाने की मांग तेजी से बदल रही है। पहले जहां इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से व्रत और पारंपरिक व्यंजनों में होता था, वहीं अब रोस्टेड और फ्लेवर्ड मखाना एक लोकप्रिय स्नैक बन चुका है।
चीज, पुदीना, मसाला, पेरि-पेरि और अन्य स्वादों में उपलब्ध मखाना शहरी युवाओं और बच्चों के बीच भी लोकप्रिय हो रहा है। संगठित स्नैक और एफएमसीजी कंपनियों के बाजार में उतरने से मखाने की पैकेजिंग, ब्रांडिंग और उपलब्धता में भी बदलाव आया है।
पोषण के कारण बढ़ी लोकप्रियता
मखाने को पौष्टिक स्नैक के रूप में पसंद किए जाने का एक प्रमुख कारण इसकी पोषण संबंधी खूबियां हैं। इसमें प्रोटीन, खनिज और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं तथा वसा की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इसमें मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, आयरन और कैल्शियम जैसे खनिज भी मौजूद होते हैं।
हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ को किसी बीमारी का इलाज या सभी लोगों के लिए पूरी तरह सुरक्षित मानना उचित नहीं है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों को अपने आहार में मखाने को शामिल करने से पहले चिकित्सक या पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। खासकर बाजार में उपलब्ध फ्लेवर्ड मखाने में नमक, चीनी या अन्य सामग्री की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।
किसानों के लिए बन सकता है आय का मजबूत आधार
मखाने की बढ़ती घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रही है। यदि बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक, उचित मूल्य, प्रसंस्करण सुविधाएं और मजबूत बाजार उपलब्ध कराया जाए तो मखाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाला महत्वपूर्ण उत्पाद बन सकता है।
भारत के सामने अब चुनौती केवल अधिक मखाना पैदा करने की नहीं है। गुणवत्ता, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, निर्यात मानकों और किसानों को उचित मूल्य से जुड़ी पूरी व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।
मखाने की कहानी यह बताती है कि पारंपरिक भारतीय कृषि उत्पाद आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार रणनीति के सहारे वैश्विक पहचान हासिल कर सकते हैं। यदि उत्पादन से लेकर निर्यात तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत किया गया, तो मखाना आने वाले वर्षों में भारत के कृषि-आधारित निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।

