जीवन का सार है राम की मर्यादा और कृष्ण का माधुर्य
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)
भगवान कृष्ण की बहुपत्नीत्व-लीला और राम के एक-पत्नीव्रत—इन दोनों को यदि ‘इतिहास’ या ‘सामाजिक आचरण’ की कसौटी पर नहीं, बल्कि ‘दार्शनिक-आध्यात्मिक संकेत’ के रूप में समझा जाए, तो उनके बीच का गहरा भेद और सामंजस्य दोनों स्पष्ट होते हैं।
वैष्णव परंपरा में श्रीकृष्ण को पूर्ण लीला पुरुषोत्तम और श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। रामावतार में भगवान स्वयं को आदर्श मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं, ताकि सामान्य गृहस्थ उनके जीवन से आचरण के नियम सीख सके। इसी कारण उनके व्यवहार में एक-पत्नीव्रत, राजधर्म, पुत्रधर्म और पितृभक्ति का कठोर पालन दिखाई देता है। कृष्णावतार में वही परमात्मा बंधन-मुक्त, सहज और रसपूर्ण चित्त की चरम लीला के रूप में प्रकट होते हैं। यहाँ उद्देश्य ‘अनंत प्रेम’ की पराकाष्ठा का रहस्य उद्घाटित करना है। एक रूप ‘मर्यादा’ को आदर्श बनाता है, दूसरा ‘माधुर्य’ को—दार्शनिक दृष्टि से दोनों मिलकर धर्म और प्रेम की संपूर्णता रचते हैं।
पुराणों में द्वारकाधीश कृष्ण की प्रमुख रानी के रूप में रुक्मिणी का वर्णन है। वे विदर्भराज भीष्मक की पुत्री और कृष्ण की ‘धर्मपत्नी’ हैं। रुक्मिणी तथा अन्य रानियाँ गृहस्थ-धर्म, सामाजिक दायित्व और लोक-व्यवहार की पूर्णता का द्योतक हैं। द्वारका का राजतंत्र, परिवार और कुल-मर्यादा इन्हीं के माध्यम से व्यवस्थित होता है। यहाँ अनेक रानियाँ काम-विकास का संकेत नहीं, बल्कि यह बोध कराती हैं कि परमात्मा असंख्य जीवात्माओं का आश्रय है—हर जीव अपने-अपने भाव से उनसे संबंध स्थापित करता है।
राधा का नाम भागवत में प्रत्यक्ष न सही, पर गौड़ीय, निम्बार्क और राधावल्लभ जैसी वैष्णव परंपराओं में उन्हें कृष्ण-प्रेम की सर्वोच्च मूर्ति माना गया है। यहाँ ‘स्वकीय’ और ‘परकीय’—दो भावों की व्याख्या मिलती है। गौड़ीय परंपरा परकीय-भाव को सर्वोच्च मानती है, जहाँ सामाजिक विधानों से परे केवल प्रेम और समर्पण शेष रहता है। गोपिकाओं का कृष्ण के लिए सर्वस्व-त्याग लौकिक व्यभिचार नहीं, बल्कि यह शिक्षा है कि ‘परम प्रेम’ के क्षण में संसार के आग्रह गौण हो जाते हैं। इसी कारण भक्ति-दर्शन में ‘पत्नी’ रुक्मिणी से अधिक ‘प्रेमिका’ राधा और गोपियों का प्रेम महत्त्वपूर्ण माना गया—नियमों से नहीं, शुद्ध भाव से उपजा आध्यात्मिक प्रेम।
दार्शनिक दृष्टि से रुक्मिणी-कृष्ण और राधा-कृष्ण अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं। रुक्मिणी-कृष्ण ‘धर्मसम्मत गृहस्थ-संबंध’ का आदर्श हैं—विवाह को जिम्मेदारी, संरक्षण और करुणा का बंधन बनाते हैं। राधा-कृष्ण ‘परम प्रेम’ का रूपक हैं—जहाँ आत्मा और परमात्मा के बीच कोई दूरी नहीं रहती। वैष्णव आचार्यों ने राधा को कृष्ण-शक्ति, उनके प्रेम-स्वरूप का ही व्यक्त रूप बताया है; इसलिए कहा गया कि कृष्ण ‘पत्नी’ के रूप में रुक्मिणी से जुड़े हैं, पर ‘प्रेम’ के शिखर पर राधा से।
शास्त्रों में रामचंद्र को एक-पत्नीव्रती का आदर्श कहा गया है। उनका व्रत केवल व्यक्तिगत नैतिकता नहीं, बल्कि उस युग में एक शक्तिशाली सामाजिक संदेश था—जहाँ बहुपत्नी-प्रथा सामान्य मानी जाती थी। रामायण को कई वैष्णव लेखक ‘शरणागति-वेदा’ कहते हैं, जहाँ मुख्य शिक्षा है—पहले ‘उत्तम मनुष्य’ बनो। जो राम की मर्यादा सीख लेता है, वही कृष्ण की भावपूर्ण लीला को समझने का अधिकारी बनता है। अर्थात् राम-चरित धर्म का व्याकरण है, और कृष्ण-चरित प्रेम की काव्यात्मकता। व्याकरण के बिना कविता समझ में नहीं आती; उसी प्रकार राम की मर्यादा के बिना कृष्ण की लीला का मर्म भी यथार्थ रूप में नहीं खुलता। (विभूति फीचर्स)
