खुशियों और मीठास से जुड़ा है होली का त्योहार

होली देती है सकारात्मकता, प्रेम और सद्भावना का संदेश
 
चंद्रग्रहण का खगोलीय महत्व 3 मार्च 2026 को पूर्ण चंद्रग्रहण होगा, जिसे ‘ब्लड मून’ भी कहा जाता है। इस दौरान पृथ्वी की छाया चंद्रमा को पूर्णतः ढक लेती है, जिससे वह लालिमा लिए दिखाई देता है। भारत के कुछ हिस्सों में यह दृश्य प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकेगा। सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व महंत विशाल गौड़ के अनुसार, त्योहार सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं और पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाते हैं। रंग, संगीत, नृत्य और पारंपरिक व्यंजन समाज में एकजुटता का भाव उत्पन्न करते हैं। होली का मुख्य संदेश है — चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, अंततः अच्छाई की ही विजय होती है। यह पर्व हमें सकारात्मक सोच, प्रेम, क्षमा और सद्भावना के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
महंत विशाल गौड़
होली हिन्दू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत लोकप्रिय त्योहार है, जिसे फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह रंगों, उल्लास, प्रेम और सामाजिक एकता का पर्व है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर गुलाल लगाते हैं, पिचकारी से रंग उड़ाते हैं और गुझिया व अन्य पारंपरिक मिठाइयों का आनंद लेते हैं।
होली का त्योहार जीवन में खुशियों और मिठास घोलने का संदेश देता है। यह मित्रता, भाईचारे और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति की तरह ही मानव जीवन में भी नए उत्साह का संचार होता है।

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होली 2026 की तिथि और चंद्रग्रहण

वर्ष 2026 में होली के अवसर पर पूर्ण चंद्रग्रहण पड़ रहा है। 3 मार्च 2026 को पूर्ण चंद्रग्रहण (ब्लड मून) होने के कारण रंग खेलने की परंपरा 4 मार्च को निभाई जाएगी।
होलिका दहन (छोटी होली) – 2 मार्च 2026 (मंगलवार)
पूर्ण चंद्रग्रहण – 3 मार्च 2026
रंगवाली होली / धुलंडी – 4 मार्च 2026 (बुधवार)
ग्रहण और सूतक काल को ध्यान में रखते हुए 4 मार्च को रंगों की होली मनाने की सलाह दी गई है।

होलिका दहन का पौराणिक महत्व

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह कथा राक्षस राजा हिरण्यकश्यप, उसकी बहन होलिका और भगवान प्रह्लाद से जुड़ी है।
हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानने लगा था और चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए। अंततः होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। किंतु ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। यह घटना सत्य की विजय का प्रतीक मानी जाती है।

होली का जन्मस्थान: विभिन्न मान्यताएं

महंत विशाल गौड़ के अनुसार, होलिका दहन का प्रमुख पौराणिक स्थल बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी स्थित सिकलीगढ़ धरहरा को माना जाता है, जहां आज भी ‘प्रह्लाद स्तंभ’ विद्यमान है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार उत्तर प्रदेश के एरच (झांसी के पास) को भी होलिका दहन का स्थल माना जाता है।
इसके अतिरिक्त, वृंदावन और बरसाना में राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी रंगभरी होली विश्व प्रसिद्ध है।

राधा-कृष्ण और रंगों की परंपरा

पौराणिक ग्रंथ गार्ग संहिता में राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।
कथा के अनुसार, सांवले कृष्ण को यह चिंता थी कि गोरी राधा उन्हें पसंद करेंगी या नहीं। तब माता यशोदा ने उन्हें राधा के चेहरे पर रंग लगाने की सलाह दी। तभी से रंगों की होली का प्रचलन प्रारंभ हुआ।

चंद्रग्रहण का खगोलीय महत्व

3 मार्च 2026 को पूर्ण चंद्रग्रहण होगा, जिसे ‘ब्लड मून’ भी कहा जाता है। इस दौरान पृथ्वी की छाया चंद्रमा को पूर्णतः ढक लेती है, जिससे वह लालिमा लिए दिखाई देता है। भारत के कुछ हिस्सों में यह दृश्य प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकेगा।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

महंत विशाल गौड़ के अनुसार, त्योहार सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं और पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाते हैं। रंग, संगीत, नृत्य और पारंपरिक व्यंजन समाज में एकजुटता का भाव उत्पन्न करते हैं।
होली का मुख्य संदेश है —
चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, अंततः अच्छाई की ही विजय होती है।
यह पर्व हमें सकारात्मक सोच, प्रेम, क्षमा और सद्भावना के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

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