चीनी, एथेनॉल और गन्ने के रस की एक बूंद में उलझा देश का भविष्य
(डॉ. दीपक गोस्वामी — विनायक फीचर्स)
गन्ने के खेत से लेकर चाय की प्याली तक और गांव की पगडंडी से लेकर देश की ऊर्जा नीति तक—गन्ने के रस की हर बूंद भारत के भविष्य से जुड़ी एक बड़ी कहानी कहती है। यही रस चीनी और गुड़ बनकर हमारी थाली में मिठास घोलता है और अब इसका एक हिस्सा एथेनॉल बनकर पेट्रोल में मिलाया जा रहा है।
इसलिए सवाल केवल चीनी के दाम बढ़ने या घटने का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत आने वाले वर्षों में एक ही कृषि संसाधन से भोजन और ईंधन, दोनों की जरूरतें संतुलित रूप से पूरी कर पाएगा?
एक गन्ना, दो बड़ी राष्ट्रीय जरूरतें
गन्ने को चीनी मिल में पहुंचाने पर उससे चीनी के साथ शीरा और दूसरे उत्पाद मिलते हैं। यही कृषि संसाधन जब एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जाता है तो वह देश की ऊर्जा जरूरतों में योगदान देता है। यानी गन्ने के सामने दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आवश्यकताएं खड़ी हैं—खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा।भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में चाय, मिठाई, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और धार्मिक प्रसाद से लेकर घरेलू रसोई तक चीनी की व्यापक मांग है। दूसरी ओर भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था लंबे समय से आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रही है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति इसी आयात निर्भरता को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
एथेनॉल गन्ने के रस और शीरे के अलावा मक्का तथा अन्य कृषि स्रोतों से भी तैयार किया जा सकता है। पेट्रोल में इसका मिश्रण बढ़ने से पेट्रोलियम आयात की जरूरत कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।
गन्ने के रस का रुख किस ओर?
यहीं से असली चुनौती शुरू होती है।गन्ने से एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का रस, बी-हैवी शीरा और सी-हैवी शीरा जैसे स्रोत इस्तेमाल किए जाते हैं। जब गन्ने के रस या बी-हैवी शीरे का अधिक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है तो चीनी बनाने के लिए उपलब्ध संसाधन प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी तरफ यदि चीनी उत्पादन को प्राथमिकता दी जाए तो एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्यों पर दबाव पड़ सकता है।खेत वही, किसान वही, पानी वही और गन्ने का रस भी वही—लेकिन राष्ट्रीय जरूरतें दो अलग दिशाओं में हैं। इस संतुलन को साधना सरकार, चीनी उद्योग और किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
मौसम और पानी भी तय करेंगे भविष्य
गन्ने की कहानी केवल चीनी और एथेनॉल तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध पानी से भी है। गन्ना अपेक्षाकृत अधिक पानी मांगने वाली फसल है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में वर्षा और जल उपलब्धता का उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।
कमजोर मानसून की स्थिति में सिंचाई का दबाव बढ़ सकता है। इससे खेती की लागत बढ़ती है और उत्पादन प्रभावित होने का खतरा रहता है। यदि उत्पादन घटा तो चीनी की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए भविष्य की गन्ना नीति में केवल यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि कितनी चीनी या कितना एथेनॉल बना, बल्कि यह भी देखना होगा कि इसके लिए कितने जल और कृषि संसाधनों का इस्तेमाल हुआ।
किसान के लिए हर गन्ना आय का आधार
गन्ने का प्रत्येक डंठल किसान के लिए उसकी मेहनत और आय का परिणाम है। बीज, खाद, सिंचाई, बिजली, डीजल, मजदूरी और परिवहन की बढ़ती लागत के बीच किसान को उचित मूल्य के साथ समय पर भुगतान की जरूरत होती है।दूसरी ओर चीनी मिलों के सामने भी अपनी आर्थिक चुनौतियां हैं। उन्हें किसानों से गन्ना खरीदना, चीनी का उत्पादन, भंडारण और बाजार में बिक्री—इन सभी खर्चों को संभालना पड़ता है। इसलिए चीनी की कीमत केवल उपभोक्ता का मुद्दा नहीं है। इसके पीछे किसान, चीनी मिल, सरकार, पेट्रोलियम उद्योग और उपभोक्ता बाजार, सभी जुड़े हुए हैं।
महंगी चीनी का असर केवल चाय तक नहीं
जब चीनी महंगी होती है तो इसका प्रभाव घर की चाय तक सीमित नहीं रहता। मिठाइयों, बेकरी उत्पादों, पेय पदार्थों और अन्य खाद्य वस्तुओं की लागत भी बढ़ सकती है।मिठाई और प्रसाद पर निर्भर धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में इसका असर और अधिक दिखाई दे सकता है। हलवाई से लेकर छोटे दुकानदार तक को बढ़ी हुई लागत का सामना करना पड़ता है और अंततः उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ता तक पहुंचता है। यानी एक तरफ गन्ना किसान बेहतर कीमत चाहता है, दूसरी तरफ उपभोक्ता सस्ती चीनी चाहता है और तीसरी तरफ देश को ऊर्जा सुरक्षा के लिए एथेनॉल चाहिए।
निर्यात नीति भी महत्वपूर्ण
चीनी का निर्यात बढ़ाने से उद्योग को लाभ और देश को विदेशी मुद्रा मिल सकती है, लेकिन घरेलू बाजार में आपूर्ति घटने पर कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।इसके विपरीत निर्यात पर प्रतिबंध घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने में मदद कर सकता है, लेकिन इससे चीनी उद्योग की आय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की स्थिति प्रभावित हो सकती है।इसलिए चीनी नीति में अचानक लिए गए फैसलों के बजाय उत्पादन, खपत, मौसम, एथेनॉल की जरूरत और निर्यात संभावनाओं का पूर्वानुमान बेहद जरूरी है।
एथेनॉल के लिए मक्का और दूसरे स्रोतों की भूमिका
एथेनॉल उत्पादन में मक्का और अन्य कृषि स्रोतों की भूमिका बढ़ाना गन्ने पर दबाव कम कर सकता है। इससे ऊर्जा नीति को केवल एक फसल पर निर्भर रहने से बचाया जा सकता है। लेकिन अनाज आधारित एथेनॉल में खाद्य सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा है। भोजन के लिए इस्तेमाल होने वाले अनाज का कितना हिस्सा ऊर्जा उत्पादन में लगाया जाए, इसका फैसला आर्थिक लाभ के साथ-साथ खाद्य उपलब्धता को ध्यान में रखकर करना होगा।
ब्राजील ने गन्ने और एथेनॉल के क्षेत्र में लंबा अनुभव हासिल किया है। भारत उससे सीख जरूर सकता है, लेकिन देश की कृषि व्यवस्था, जल संसाधन, किसान संरचना और बाजार की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार समाधान तैयार करना होगा।
भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती—पानी
गन्ने की अर्थव्यवस्था का सबसे संवेदनशील पक्ष जल संसाधन है। जिन क्षेत्रों में भूजल पहले से दबाव में है, वहां गन्ने का लगातार विस्तार भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि एक हेक्टेयर से कितना गन्ना या कितना एथेनॉल मिला। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस उत्पादन के लिए कितना पानी खर्च हुआ और किसान की वास्तविक आय कितनी बढ़ी।
रास्ता क्या हो सकता है?
इस चुनौती से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।
पहला—प्रति बूंद अधिक फसल।
ड्रिप सिंचाई, उन्नत किस्मों, वैज्ञानिक खेती और जल संरक्षण को गन्ने की खेती का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।
दूसरा—गन्ने पर निर्भरता कम करना।
मक्का, कृषि अवशेष और अन्य उपयुक्त स्रोतों से एथेनॉल उत्पादन की क्षमता बढ़ानी होगी, ताकि ऊर्जा नीति का पूरा भार गन्ने पर न पड़े।
तीसरा—चीनी और एथेनॉल के बीच संतुलन।
सरकार को उत्पादन के अनुमान और घरेलू जरूरतों को देखते हुए पहले से स्पष्ट नीति तैयार करनी चाहिए कि कितना संसाधन खाद्य बाजार के लिए सुरक्षित रखा जाए और कितना ऊर्जा उत्पादन में इस्तेमाल हो।
चौथा—किसानों को समय पर भुगतान।
किसान के लिए केवल बेहतर मूल्य ही नहीं, बल्कि भुगतान की निश्चितता और समयबद्धता भी बेहद महत्वपूर्ण है।
पांचवां—चीनी की खपत को लेकर जागरूकता।
अत्यधिक चीनी का सेवन स्वास्थ्य के लिहाज से भी उचित नहीं माना जाता। खाद्य उद्योग और उपभोक्ताओं में अतिरिक्त चीनी पर निर्भरता कम करने की दिशा में जागरूकता बढ़ाना भी उपयोगी हो सकता है।
एक बूंद में किसान, उपभोक्ता और ऊर्जा सुरक्षा
भारत के सामने चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें किसान की आय बढ़े, उपभोक्ता को उचित कीमत मिले, चीनी उद्योग आर्थिक रूप से टिकाऊ रहे, ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटे और जल संसाधन सुरक्षित रहें।आज गन्ने के रस की एक बूंद केवल मिठास नहीं है। वह किसान की आय है, घर की रसोई है, पेट्रोल की कीमत है, विदेशी मुद्रा की बचत है और भूजल के भविष्य से जुड़ा सवाल भी है।
भारत को यह तय करना होगा कि गन्ने के रस की उस बूंद को किस दिशा में बहाया जाए। यदि खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बिगड़ा तो समस्या केवल चीनी की कीमत तक सीमित नहीं रहेगी।लेकिन यदि यह संतुलन वैज्ञानिक नीति, जल संरक्षण और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए साध लिया गया, तो गन्ने की यही फसल किसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और देश की ऊर्जा सुरक्षा—तीनों के लिए भविष्य की ताकत बन सकती है। गन्ने के रस की एक बूंद छोटी जरूर है, लेकिन उसमें भारत के भविष्य का सवाल बहुत बड़ा है।

