सरकार ने सलाह दी विदेश जाकर ज्यादा खर्च न करें और वहां से सोना खरीदने से बचें
मुकेश “कबीर” : सरकार ने सलाह दी कि विदेश जाकर ज्यादा खर्च न करें और वहां से सोना खरीदने से बचें। इस पर सबसे ज्यादा नाराजगी उन लोगों में दिखाई दी जो न कभी विदेश गए, न ही कभी वहां से कुछ खरीदने की स्थिति में रहे। जो लोग मोहल्ले से बाहर जाने के लिए भी पड़ोसी की गाड़ी का इंतजार करते हैं, वही अब निजी वाहनों के कम उपयोग की सलाह पर बहस कर रहे हैं। और जिन्होंने कभी गणित से डरकर पढ़ाई छोड़ दी थी, वे आज अर्थव्यवस्था पर लंबी-लंबी चर्चाएं करते नजर आ रहे हैं।
असल में आम आदमी की नाराजगी और खुशी दोनों ही अस्थायी होती हैं। कुछ साल तक नाराजगी चलती है, फिर चुनाव के समय किसी नई योजना या मुफ्त सुविधा की घोषणा के साथ माहौल बदल जाता है। राजनीति की पतंगबाजी में कब ढील देनी है और कब डोर खींचनी है, यह सत्ता को अच्छी तरह पता होता है।
व्यंग्य यह भी है कि आम जनता को पेट्रोल बचाने की सलाह दी जाती है, जबकि बड़े आयोजनों और शपथ समारोहों में गाड़ियों के लंबे काफिले दिखाई देते हैं। शायद खास लोगों की गाड़ियां अलग ईंधन से चलती हों, या फिर उन्हें धक्का देने के लिए कार्यकर्ता हमेशा मौजूद रहते हों।
लेख में आम और खास के रिश्ते पर भी कटाक्ष किया गया है—एक तरफ जनता वोट देकर सत्ता तक पहुंचाती है, दूसरी तरफ चुनावी वादों और योजनाओं के जरिए उसे साधा जाता है। सवाल यह भी उठाया गया कि यदि सरकारी खजाना वास्तव में खाली है, तो चुनावों में इतना पैसा आखिर आता कहां से है।
व्यंग्यकार ने पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए उस प्रवृत्ति पर भी तंज कसा है, जिसमें हर आर्थिक कठिनाई के समय तुलना पड़ोसी देश से की जाती है। जनता को यह समझाने की कोशिश की जाती है कि “वहां हालत ज्यादा खराब है”, इसलिए यहां की समस्याओं को कम गंभीर माना जाए।
अंत में लेखक ने “सोने” शब्द पर हल्का हास्य जोड़ते हुए कहा कि उन्होंने विदेश जाकर सोना खरीदना तो छोड़ ही दिया है, अब सोना यानी नींद भी कम कर दी है। पहले 10-12 घंटे सोते थे, अब केवल 11 घंटे में काम चला लेते हैं। पूरा लेख व्यवस्था, राजनीति, आर्थिक सलाहों और आम आदमी की मानसिकता पर हल्के-फुल्के लेकिन तीखे व्यंग्य के जरिए सवाल उठाता है।
