कलियुग में राम नाम की पताका फहराने वाले महान संत गोस्वामी तुलसीदास
अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)
हिंदी साहित्य के सूर्य, भक्ति के अथाह समुद्र और लोकचेतना के महान शिल्पी गोस्वामी तुलसीदास का नाम स्मरण होते ही करोड़ों कंठों से सहज ही ‘राम-राम’ का उच्चारण होने लगता है। तुलसीदास ने अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल भगवान श्रीराम की कथा को जन-जन तक पहुंचाया, बल्कि सामाजिक और धार्मिक रूप से बिखरते समाज को भी भक्ति, समन्वय और लोकमंगल की भावना से जोड़ने का अद्भुत कार्य किया।
उनका संपूर्ण जीवन और साहित्य इस बात का प्रमाण है कि एक संत और कवि अपनी साधना के माध्यम से युग की चेतना को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कलियुग में राम नाम की ऐसी पताका फहराई, जिसकी छाया आज भी भारतीय जनमानस पर दिखाई देती है।
जन्म को लेकर मतभेद, लेकिन प्रतिभा निर्विवाद
तुलसीदास के जन्मकाल और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं। कुछ विद्वान उनका जन्म विक्रम संवत 1589 मानते हैं, जबकि बाबा वेणी माधव दास और बाबा रघुवर दास के ‘गुसाईं-चरित’ के आधार पर विक्रम संवत 1554 को उनका जन्मकाल माना गया है।
प्रचलित पंक्तियां हैं—
पन्द्रह सौ चौवन बिसै कालिंदी के तीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी तुलसी धरयो शरीर॥
उनके जन्मस्थान को लेकर भी राजापुर और सोरों के बीच मतभेद रहा है, हालांकि राजापुर को लेकर अधिक समर्थन मिलता है। उनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी बताया जाता है। रहीम ने भी तुलसी की माता का उल्लेख करते हुए लिखा—
सुरतिय, नरतिय, नागतिय सब चाहत अस होय।
गोद लिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय॥
कठिन परिस्थितियों में बीता बाल्यकाल
तुलसीदास का बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उनकी रचनाओं में भी बाल्यकाल की पीड़ा और अभावों की झलक मिलती है। जीवन के शुरुआती दौर में उन्हें माता-पिता के स्नेह से वंचित होना पड़ा और अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसी संघर्षपूर्ण जीवन में उनका संपर्क बाबा नरहरिदास से हुआ। उन्होंने तुलसीदास के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की तथा उनके भीतर रामभक्ति का बीज रोपा। स्वयं तुलसीदास ने अपने गुरु से सुनी रामकथा को स्मरण करते हुए लिखा—
मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा जो सूकर खेत।
समुझी नहीं तसि बालपन, तब अति रहेउं अचेत॥
बाद में वे काशी पहुंचे, जहां उन्होंने शेष सनातन जैसे विद्वानों से वेद, वेदांग, दर्शन, पुराण और अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया।
गृहस्थ जीवन से विरक्ति और रामभक्ति की ओर प्रस्थान
शिक्षा पूर्ण करने के बाद तुलसीदास अपने क्षेत्र में लौटे और रत्नावली से विवाह कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। कहा जाता है कि वे अपनी पत्नी से अत्यधिक अनुरक्त थे। रत्नावली द्वारा उन्हें दी गई वैराग्यपूर्ण सीख ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
इसके बाद तुलसीदास काशी चले गए और उनका जीवन रामभक्ति, साधना, साहित्य-सृजन तथा तीर्थाटन को समर्पित हो गया। चित्रकूट में हनुमान जी की कृपा से श्रीराम के दर्शन की कथा उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक घटनाओं में गिनी जाती है।
रामचरितमानस ने बदल दी लोकभाषा में भक्ति की दिशा
विक्रम संवत 1631 में रामचरितमानस की रचना आरंभ हुई और परंपरा के अनुसार लगभग दो वर्ष सात महीने में यह महान ग्रंथ पूर्ण हुआ। संस्कृत तक सीमित धार्मिक ज्ञान को लोकभाषा में पहुंचाने की दृष्टि से इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा।
तुलसीदास ने रामकथा को केवल धार्मिक आख्यान के रूप में नहीं लिखा, बल्कि उसमें लोकमंगल, नीति, मर्यादा, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों को भी प्रमुख स्थान दिया।
उनकी भक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ की नहीं, बल्कि व्यापक लोककल्याण की भक्ति थी। वे भगवान राम के माध्यम से धर्म, मर्यादा और समाज में एकता स्थापित करना चाहते थे।
समन्वय की अद्भुत दृष्टि
तुलसीदास का सबसे बड़ा योगदान उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण में दिखाई देता है। जिस समय समाज में विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक मतों के बीच मतभेद थे, उस समय उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समन्वय का मार्ग प्रस्तुत किया।
शैव और वैष्णव मतों के बीच बढ़ते वैमनस्य को दूर करने के लिए उन्होंने भगवान राम के मुख से कहलवाया—
शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहु मोहि न भावा॥
इसी प्रकार सगुण और निर्गुण के विवाद को भी उन्होंने समन्वय की दृष्टि से देखा—
अगुनहिं सगुनहिं नहि कछु भेदा।
यही व्यापक दृष्टि तुलसीदास को केवल भक्त कवि नहीं, बल्कि लोकनायक और समाज-संयोजक के रूप में स्थापित करती है।
तुलसी की भक्ति में दास्य भाव
तुलसीदास की भक्ति में दास्य भाव की प्रमुखता दिखाई देती है। वे स्वयं को प्रभु का सेवक मानकर अपनी विनम्रता व्यक्त करते हैं—
तुमसो बड़ो है कौन, मोसो कौन छोटो।
तुम सो खरो है कौन, मोसो कौन खोटो॥
उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन का आधार थे। उन्होंने गणपति सहित विभिन्न देवी-देवताओं की वंदना करते हुए भी अंततः श्रीराम की कृपा की कामना की—
मांगत तुलसीदास कर जोरे।
बसहु रामसिय मानस मोरे॥
साहित्य में तुलसी का विराट योगदान
तुलसीदास की रचनाधर्मिता अत्यंत व्यापक थी। उनके नाम से अनेक ग्रंथ जुड़े हैं, लेकिन सामान्यतः निम्न प्रमुख रचनाओं को प्रमाणित माना जाता है—
- रामचरितमानस
- विनय पत्रिका
- कवितावली
- गीतावली
- दोहावली
- रामलला नहछू
- पार्वती मंगल
- जानकी मंगल
- बरवै रामायण
- वैराग्य संजीवनी
- कृष्ण गीतावली
- रामाज्ञा प्रश्नावली
तुलसीदास ने संस्कृत, अवधी और ब्रज—तीनों भाषाओं में अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया। रामचरितमानस और बरवै रामायण में अवधी का प्रभाव दिखाई देता है, जबकि कवितावली, गीतावली और विनय पत्रिका जैसी रचनाओं में ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग मिलता है।
राजाओं से लेकर संतों तक सभी हुए प्रभावित
तुलसीदास की विद्वता और भक्ति से प्रभावित होने वालों में अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराज मानसिंह, टोडरमल, बीरबल, नाभादास और मधुसूदन सरस्वती जैसे अनेक विद्वान एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल बताए जाते हैं।
उनके जीवन के उत्तरार्ध में उन्हें व्यापक सम्मान मिला। अपनी स्थिति में आए इस परिवर्तन को उन्होंने स्वयं व्यंग्यात्मक विनम्रता के साथ लिखा—
घर-घर मांगे टूक, पुनि भूपति पूजे पांव।
तुलसी गुसाईं भयो, भोरे दिन भूल गया॥
रामभक्ति की अमर ज्योति
तुलसीदास का निधन कब हुआ, इसे लेकर भी मतभेद मिलते हैं। एक प्रसिद्ध पंक्ति है—
संवत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर॥
वहीं ‘गुसाईं चरित’ में तिथि का अलग उल्लेख मिलता है। इसी कारण उनके निधन की तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद आज भी मौजूद है।लेकिन तुलसीदास के जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई उनकी मृत्यु की तिथि नहीं, बल्कि उनकी अमर साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत है।उन्होंने राम को केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें भारतीय जनमानस के जीवन, भाषा, लोकगीतों, संस्कारों और सामाजिक चेतना का हिस्सा बना दिया। उनकी लेखनी ने भक्ति को विद्वानों के दायरे से निकालकर गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाया। गोस्वामी तुलसीदास इसलिए केवल हिंदी के महान कवि नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकचेतना के ऐसे अमर हस्ताक्षर हैं, जिनकी रामभक्ति की ज्योति सदियों बाद भी उतनी ही उज्ज्वल है। (विभूति फीचर्स)
