डिजिटल कट्टरता का बढ़ता खतरा: इंटरनेट के जरिए फैलता उग्रवाद समाज के लिए बड़ी चुनौती

The Growing Threat of Digital Radicalization: Extremism Spreading via the Internet Poses a Major Challenge to Society
 
डिजिटल कट्टरता का बढ़ता खतरा: इंटरनेट के जरिए फैलता उग्रवाद समाज के लिए बड़ी चुनौती

(मनोज कुमार अग्रवाल - विनायक फीचर्स)

Mira Road में हाल ही में हुई चाकूबाजी की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इंटरनेट और सोशल मीडिया अब कट्टरपंथ फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं। धर्म पूछकर दो सुरक्षा गार्डों पर हमला करने की यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि समाज में तेजी से फैल रही वैचारिक कट्टरता का गंभीर संकेत भी है।

पुलिस जांच के अनुसार आरोपी ने कथित तौर पर पीड़ितों से उनका धर्म पूछा और धार्मिक बातें करने के बाद उन पर हमला कर दिया। आरोपी के पास से कुछ ऐसे दस्तावेज और नोट्स भी मिले हैं, जिनमें उग्रवादी विचारधारा से जुड़े शब्द लिखे होने की बात सामने आई है। जांच एजेंसियां इस पूरे मामले की हर एंगल से पड़ताल कर रही हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि आरोपी उच्च शिक्षित बताया जा रहा है और विदेश में भी रह चुका है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कट्टरपंथ केवल अशिक्षा या गरीबी तक सीमित नहीं रह गया है। डिजिटल माध्यमों के जरिए पढ़े-लिखे लोग भी तेजी से उग्र विचारधाराओं के प्रभाव में आ रहे हैं।

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इंटरनेट और ‘सेल्फ रेडिकलाइजेशन’ का खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार आज का दौर “सेल्फ रेडिकलाइजेशन” यानी आत्म-उग्रवादीकरण का है। पहले आतंकी गतिविधियां संगठित नेटवर्क के जरिए संचालित होती थीं, लेकिन अब सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड ऐप्स और ऑनलाइन प्रोपेगेंडा सामग्री के जरिए कोई भी व्यक्ति धीरे-धीरे कट्टर सोच से प्रभावित हो सकता है।

यही वजह है कि दुनिया भर में “लोन वुल्फ अटैक” यानी अकेले व्यक्ति द्वारा किए गए हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे मामलों में हमलावर किसी बड़े नेटवर्क से सीधे जुड़े हुए नजर नहीं आते, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए पहले से खतरे का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है।

समाज और परिवार की भी बड़ी जिम्मेदारी

विशेषज्ञ मानते हैं कि कट्टरपंथ को रोकने में केवल कानून व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं है। परिवार, मित्र, शिक्षण संस्थान और समाज भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे — जैसे सामाजिक अलगाव, अत्यधिक कट्टर विचार या संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियां — तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।

युवाओं के साथ संवाद बनाए रखना, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना और उन्हें सकारात्मक सामाजिक माहौल देना बेहद जरूरी है। कई बार अकेलापन, निराशा और पहचान का संकट भी लोगों को चरमपंथी सोच की ओर धकेल सकता है।

सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को साइबर मॉनिटरिंग और डिजिटल सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करना होगा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है ताकि नफरत फैलाने वाली सामग्री और उग्रवादी प्रचार को समय रहते रोका जा सके।

इसके साथ ही डि-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम, डिजिटल साक्षरता और आलोचनात्मक सोच को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाना समय की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोग जरूरी है, क्योंकि ऑनलाइन कट्टरता की जड़ें अक्सर कई देशों तक फैली होती हैं।

संतुलित और जिम्मेदार दृष्टिकोण की जरूरत

ऐसी घटनाओं के बाद समाज में भय और अविश्वास का माहौल बनना स्वाभाविक है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के अपराध के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं माना जा सकता। आतंकवाद और कट्टरता का मुकाबला कानून, सामाजिक जागरूकता और आपसी विश्वास के जरिए ही किया जा सकता है।

Mira Road की यह घटना एक चेतावनी की तरह है कि बदलते दौर में आतंकवाद और कट्टरता का स्वरूप भी बदल रहा है। अब चुनौती केवल सीमा पार से नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया के जरिए समाज के भीतर भी पैदा हो रही है।

जरूरत इस बात की है कि सरकार, समाज, परिवार और शिक्षण संस्थान मिलकर ऐसी मानसिकता को पनपने से रोकें और युवाओं को सकारात्मक दिशा दें। तभी एक सुरक्षित, शांतिपूर्ण और समावेशी समाज का निर्माण संभव हो सकेगा।

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