96 प्रकार के पिंडदान और अक्षय श्राद्ध का पावन स्थल – अमरकंटक की नर्मदा उद्गमभूमि

The holy place of 96 types of Pinddaan and Akshaya Shraddha – Narmada origin land of Amarkantak
 
 96 प्रकार के पिंडदान और अक्षय श्राद्ध का पावन स्थल – अमरकंटक की नर्मदा उद्गमभूमि
(गरिमा विजयवर्गीय – विनायक फीचर्स)
जब भी पितरों के पिंडदान और तर्पण की बात होती है, तो सबसे पहले गया जी (बिहार) का नाम सामने आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित मां नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक भी पिंडदान और श्राद्ध के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण स्थान माना गया है।

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अमरकंटक का उल्लेख शास्त्रों में

श्रीमद् वायु पुराण में अमरकंटक में पितरों के पिंडदान का पहला उल्लेख मिलता है। यहां बताया गया है कि अमरकंटक में कुशों पर किया गया पिंडदान अक्षय श्राद्ध की श्रेणी में आता है और पितरों को तृप्त करता है। यहां पितृ तर्पण करने वाला व्यक्ति स्वर्गलोक का अधिकारी माना जाता है।

96 प्रकार के पिंडदान की अनूठी व्यवस्था

भारतवर्ष में कुल 48 पिंडतीर्थ स्थान माने गए हैं, लेकिन अमरकंटक ऐसा एकमात्र स्थल है जहां 96 प्रकार के पिंडदान संभव हैं। शास्त्रों में पिंडदान के लिए नदियों के संगम को विशेष महत्व दिया गया है। इसी दृष्टि से अमरकंटक को पंचप्रयाग की संज्ञा दी गई है।
यहां सबसे पहले गायत्री-सावित्री का संगम होता है, फिर ये नदियां नर्मदा, कपिला, वैतरणी और अंत में ऐरंड नदी में मिलती हैं। स्कंद पुराण में वर्णित ऐरंड संगम को सर्वोत्तम माना गया है। मान्यता है कि इस स्थान पर एक बार पिंडदान करने से वही फल मिलता है, जो गया जी में 16 बार पिंडदान करने पर मिलता है।
पिंडदान सिर्फ पितरों के लिए नहीं
अमरकंटक के मुख्य पुजारी वंदे महाराज बताते हैं कि यहां पिंडदान केवल मृतात्माओं की शांति के लिए ही नहीं, बल्कि मनोकामना पूर्ति, सिद्धि प्राप्ति और विभिन्न आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। प्राचीन समय में पिंडदान की व्यवस्था केवल मंदिर तक सीमित थी, लेकिन अब अमरकंटक में पांच प्रमुख स्थानों पर यह अनुष्ठान संपन्न होता है।
फिर भी, नर्मदा कुंड के गर्भगृह में किया गया पिंडदान सीधे बैकुंठ प्राप्ति का मार्ग माना जाता है।

नर्मदा अवतरण की कथा

स्कंद पुराण के रेवा खंड में मां नर्मदा के धरती पर आगमन की कथा मिलती है। कहा गया है कि चंद्रवंशीय राजा पुरुरवा ने महादेव की तपस्या कर मां नर्मदा को पृथ्वी पर लाने का आग्रह किया। भगवान शंकर ने विंध्य पर्वत को नर्मदा प्रवाह का भार सौंपा और मां नर्मदा वहीं अवतरित हुईं।
राजा पुरुरवा ने मां नर्मदा के पवित्र जल से पितरों का तर्पण किया, जिससे उनके पूर्वजों को वह परम पद प्राप्त हुआ जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसी प्रकार राजर्षि हिरण्यतेजा ने भी नर्मदा जल से अपने पितरों का तर्पण कर उन्हें मुक्ति दिलाई।

अमरकंटक – प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर

अमरकंटक मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसा एक छोटा लेकिन धार्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कस्बा है।
यहां से नर्मदा और सोन नदी दोनों का उद्गम होता है।
मैकल पर्वत श्रृंखला से घिरे इस क्षेत्र में स्थित नर्मदा कुंड को कोटितीर्थ मंदिर समूह कहा जाता है, जिसके चारों ओर असंख्य शिवलिंग हैं।
पास ही कलचुरी वंश के 16वीं शताब्दी के मंदिर समूह भी स्थित हैं।
नर्मदा कुंड से निकलकर नदी आगे कपिलधारा, दुग्धधारा जैसे जलप्रपातों के रूप में बहती है और मैदानी इलाकों की ओर बढ़ती है।

नर्मदा माई की बगिया और सोनमुड़ा

स्थानीय किवदंती के अनुसार "नर्मदा माई की बगिया" वह स्थान है जहां मां नर्मदा अपने बाल्यकाल में खेला करती थीं। यहां गुलबकावली औषधि पाई जाती है, जिसके फूल का अर्क नेत्र रोगों में उपयोगी बताया गया है।
वहीं "सोनमुड़ा" वह स्थान है, जहां से सोन नदी का उद्गम होता है, जो आगे चलकर गंगा नदी में मिलती है।
 अमरकंटक केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, पौराणिक मान्यताओं और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम है। यहां किया गया पिंडदान पितरों को शांति देने के साथ-साथ साधक को भी अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

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