साथ का भ्रम….
( लेखिका नीतू माथुर )
मैं सोचती हूँ कि अगर बात अधूरी है तो
पूरी करना जरूरी नहीं
हथेली में चाहे कितना भी पानी भरो
छलकता जरूर है फिर
दोबारा कोशिश की ज़रूरत नहीं
मछली के जाल में फसने के बाद
सागर का पानी छन के निकल जाता है
रुकता नहीं, जबकि वो जानता है कि
जल ही उसका जीवन है
यहाँ अपने अस्तित्व के लिए बड़ी
जद्दोजहद है साहब ….
माँ बाप का प्यार तो असीम है
मगर कड़े अनुशासन के ताले में
पढ़ाई सब सीखा देती है मगर
अच्छा इंसान ख़ुद ही बनना पड़ता है
इश्क़ मोहब्बत बेशुमार है आजकल
मगर हँसी खेल, वचनबद्धता नहीं
जीवनसाथी तो मिलता है सभी कों
मगर हर बार साथ नहीं मिलता
अपनी ज़िंदगी खोकर बच्चों की बनाते हैं जब
वो हमें ही गुमनामी में छोड़ जाते हैं तब
एक अलग ही व्यक्तित्व बनेगा अब
अपनी दौड़ जीतकर ही
अस्तित्व बनेगा अब
आशा निराशा हर उम्मीद से परे
अपनी गाड़ी के पहिए चलाकर
चल लेंगें अपने रास्ते अलग हम
नहीं रहेगा किसी के साथ का भ्रम।
~नीतू माथुर
