लखनऊ में ब्रज का आनंद: बाबा चित्र-विचित्र की भजन संध्या में झूमे भक्त, श्री द्वारिका रमण लाल जी का प्राकट्योत्सव संपन्न
ठाकुर जी का श्रृंगार उन्हें सजाने के लिए नहीं, बुरी नजर से बचाने के लिए है: बाबा चित्र-विचित्र
शाम होते ही कन्वेंशन सेंटर का पूरा सभागार कृष्ण भक्तों से खचाखच भर गया। दिव्य भजन संध्या का शुभारंभ करते हुए बाबा चित्र-विचित्र जी महाराज ने श्रद्धालुओं को सनातन अध्यात्म का मर्म बेहद सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा ठाकुर जी का श्रृंगार उन्हें सजाने के लिए नहीं, बल्कि रसिक भक्तों द्वारा उन्हें समाज की बुरी नजर से बचाने के लिए किया जाता है। अक्सर लोग बाहरी तड़क-भड़क और तमाशे में उलझ जाते हैं और ठाकुर जी के असली व अलौकिक श्रीमुख दर्शन का आनंद लेना भूल जाते हैं।"
इसके बाद भजनों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने पूरे वातावरण को भावविभोर कर दिया। बाबा चित्र-विचित्र जी ने जब अपने सुप्रसिद्ध भजन 'करुणामय कृपामय मेरे बांके बिहारी सरकार' और 'श्री वृंदावन हम हैं अति ही दीन जन, हमको मिले तेरी शरण' की तान छेड़ी, तो भक्त अपनी सुध-बुध खो बैठे। उन्होंने संदेश दिया कि भले ही हमारा शरीर लखनऊ में हो, लेकिन हमारा मन हमेशा वृंदावन की कुंज गलियों में बसा होना चाहिए। भजन 'वृंदावन वृंदावन गाऊं रे' पर पूरा सभागार खड़े होकर झूमने और नाचने लगा।
साक्षात गर्भगृह से भक्त की गोद में आने की चमत्कारिक कहानी
उत्सव के मुख्य संयोजक और लखनऊ व्यापार मंडल के अध्यक्ष अमरनाथ मिश्रा ने इस अवसर पर ठाकुर जी (लड्डू गोपाल) के लखनऊ आगमन का एक बेहद भावुक और आंखें नम कर देने वाला संस्मरण साझा किया।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 में जब वे अपनी पत्नी के साथ गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन करने गए थे, तब उनकी पत्नी ने ठाकुर जी के प्रति अनन्य भक्ति भाव दिखाते हुए वहां के मुख्य पुजारी स्वर्गीय मन्नू जी महाराज से कोई विशेष प्रसाद देने की करुण प्रार्थना की थी। भक्त की सच्ची पुकार का असर यह हुआ कि पुजारी जी सीधे मंदिर के परम पवित्र मुख्य गर्भगृह में गए और बलदाऊ जी के विग्रह के पास विराजमान 'लड्डू गोपाल' के साक्षात विग्रह को उठाकर सीधे उनकी पत्नी की गोद में रख दिया।
वर्षों तक घर में पूर्ण निष्ठा से सेवा-अर्चना करने के बाद, भजन गायक चित्र-विचित्र जी की प्रेरणा से इस पावन दिन को एक बड़े उत्सव के रूप में मनाने की शुरुआत हुई। जब द्वारकाधीश मंदिर के पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए, तो पता चला कि वह अलौकिक दिन 28 जून 2000 (आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी) का ही था। अमरनाथ मिश्रा ने एक और दिलचस्प बात साझा की कि ये ठाकुर जी बेहद संगीतप्रेमी हैं; इन्हें सुबह जगाने के लिए रोजाना करीब 30 मिनट तक बाबा चित्र-विचित्र जी के ही मधुर भजन बजाए जाते हैं, जिसके बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं।
छप्पन भोग और भव्य महाआरती के साथ रस वर्षा का समापन
लखनऊ व्यापार मंडल के सहयोग से आयोजित इस भव्य प्राकट्योत्सव के अंतिम चरण में ठाकुर जी को अत्यंत श्रद्धा भाव के साथ छप्पन भोग लगाया गया। इसके पश्चात कपूर और दीपों की जगमगाहट के बीच भव्य महाआरती संपन्न हुई, जिसमें सैकड़ों भक्तों ने एक साथ सुर मिलाकर आरती गाई। कार्यक्रम के समापन पर सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच सादर प्रसाद का वितरण किया गया।
इस पावन और भव्य धार्मिक उत्सव में लखनऊ व्यापार मंडल के जितेंद्र चौहान, मनीष गुप्ता, अनिल वर्मानी, पवन मनोचा और कुश मिश्रा सहित शहर के अनेक गणमान्य नागरिक, समाज सेवी और हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

