मुफ्तखोरी पर न्यायपालिका के सवाल

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मुफ्तखोरी पर न्यायपालिका के सवाल
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
देश का दुर्भाग्य यही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर कई बार गैर-लोकतांत्रिक आचरण देखने को मिलता है। सत्ता प्राप्ति की होड़ में राजनीतिक दल समाज को बांटने वाली गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं। चुनाव जीतने के लिए सरकारी स्तर पर मुफ्त उपहार, सब्सिडी और नकद राशि बांटने की घोषणाएं आम बात बन चुकी हैं। घोषणा पत्रों में बिना गंभीर आर्थिक चिंतन के ऐसे वायदे कर दिए जाते हैं, मानो आकाश से तारे तोड़ लाना कोई असंभव कार्य न हो। उद्देश्य स्पष्ट होता है—येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करना

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जब सियासत देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति और दीर्घकालिक हितों को दरकिनार कर केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ पर केंद्रित हो जाए, तब स्वाभाविक रूप से न्यायपालिका से अपेक्षा बढ़ जाती है। ऐसे समय में न्यायपालिका ही वह संवैधानिक स्तंभ है, जिससे निष्पक्षता और संतुलन की आशा की जाती है।

समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था सुधार हेतु महत्वपूर्ण टिप्पणियां और निर्देश दिए हैं। चुनावों से पूर्व विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार और बैंक खातों में नकद धनराशि देने की घोषणाओं पर उच्चतम न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए प्रश्न उठाया कि यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा और इस पर नियंत्रण क्यों न लगाया जाए। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि ऐसी घोषणाएं वित्तीय अनुशासन और समान अवसर की भावना पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।
निस्संदेह, कल्याणकारी योजनाएं और सामाजिक सुरक्षा उपाय किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा हैं। निर्धन, वंचित और जरूरतमंद वर्ग को सहारा देना सरकार का दायित्व है। किंतु प्रश्न तब उठता है जब लोक-कल्याण और चुनावी प्रलोभन के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। यदि बिना दीर्घकालिक योजना और संसाधनों के आकलन के मुफ्त सुविधाएं बांटी जाएंगी, तो इससे वित्तीय संतुलन, विकास परियोजनाओं और भविष्य की पीढ़ियों पर भार बढ़ सकता है।
राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए प्रत्येक नागरिक का सक्रिय योगदान आवश्यक है। आत्मनिर्भरता, श्रम और उत्पादनशीलता ही समृद्धि के आधार हैं। यदि समाज का बड़ा वर्ग अनुदानों पर निर्भर हो जाए, तो यह प्रवृत्ति आत्मनिर्भर राष्ट्र निर्माण की भावना को कमजोर कर सकती है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल चुनावी घोषणा पत्र तैयार करते समय आर्थिक यथार्थ, वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखें। न्यायपालिका की टिप्पणियां एक चेतावनी हैं—लोकतंत्र केवल मत प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जिम्मेदार शासन की परीक्षा भी है।

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