सुख का मूलमंत्र है सबके साथ मिलकर सुखी होना
(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स) जीवन में हर व्यक्ति सुख चाहता है। हालांकि, सुख के पैमाने सबके लिए अलग-अलग होते हैं। किसी को अमीरी सुख का पर्याय लगती है, तो किसी को सच्चा प्रेम करने वाला जीवन साथी। किसी को सत्ता में खुशी दिखाई देती है, तो किसी को ऊंचाइयों पर पहुंचकर मिली शोहरत में। बुलंदी को छूने की चाह रखने वाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि—
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पर बैठे हो, वह टूट भी सकती है।
आज का बाजारवाद छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी को भ्रमित कर रहा है। उपभोक्ता संस्कृति ने जीवन मूल्यों पर गहरा प्रहार किया है। “पैसा फेंको, तमाशा देखो” की मानसिकता ने फाइव स्टार होटलों के बहु-कोर्स डिनर, मल्टीप्लेक्स की लक्ज़री और ब्रांडेड कपड़ों को सुख का प्रतीक बना दिया है। इसका सबसे बड़ा असर मिडिल और लोअर मिडिल क्लास पर पड़ा है, जहां लोग अपनी आर्थिक क्षमता से परे खर्च करते हैं और बाद में आर्थिक व मानसिक तनाव के दुष्चक्र में फंस जाते हैं।यदि व्यक्ति थोड़े में प्रसन्न रहना सीख ले, तो उसके लिए सुख के अवसर कभी कम नहीं पड़ते। कुछ रंगीन पत्थर, पटरी से खरीदी गई सस्ती माला, नई कलम, अच्छी किताब या कोई साधारण खिलौना भी आनंद दे सकता है। बच्चों में यह कला जन्मजात होती है—जब तक कि बड़े उन्हें बिगाड़ न दें।
प्रकृति से जुड़ाव रखने वालों को उसके सान्निध्य में अपार सुख मिलता है, लेकिन सच यह भी है कि प्रकृति, संगीत या विश्राम—सबकी एक सीमा होती है। अत्यधिक विश्राम भी ऊब पैदा करता है। ऊब मनुष्य जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।सुखी रहने के लिए व्यस्त रहना आवश्यक है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का कथन है कि दुखी और चिंतित होने के लिए मनुष्य के पास फालतू समय होना चाहिए। जिसके पास करने के लिए पर्याप्त काम हो, उसके पास बेकार की चिंताओं में उलझने का समय ही नहीं होता।सुख के लिए मानसिक संतुलन अत्यंत आवश्यक है, और यह सहज नहीं बनता। इसके लिए निरंतर प्रयास जरूरी है। आज ‘जीने की कला’ सिखाने वाले गुरुओं की भरमार है। तनावग्रस्त जीवन और मानसिक असंतुलन ने आध्यात्म को भी एक बिकाऊ वस्तु बना दिया है।
वास्तव में सुख हमारे भीतर ही है। कस्तूरी मृग की तरह हम उसे बाहर खोजते फिरते हैं, जबकि उसकी सुगंध हमारे अंदर ही होती है। सुख की तलाश ही लोगों को धर्म और आध्यात्म की ओर ले जाती है, लेकिन धर्म का आधुनिक संस्करण अक्सर केवल जेबें खाली करता है।आज बच्चों की मासूमियत तेजी से खत्म हो रही है। वे समय से पहले ही प्रौढ़ बनते जा रहे हैं, जबकि मासूमियत स्वयं में एक सुख है। अंग्रेज़ी की कहावत है—Ignorance is bliss। हमारी त्रासदी यह है कि हम अत्यधिक ‘ओवर-स्मार्ट’ होते जा रहे हैं।
मोबाइल आज का नया भगवान बन चुका है। हर समय उसकी आरती उतारते लोग वास्तविक दुनिया से कटते जा रहे हैं। क्या कंप्यूटर और मोबाइल के बिना लोग मूर्ख थे? तकनीक सुविधा है, जीवन नहीं। आज की पीढ़ी के लिए मोबाइल जीवनरेखा बन चुका है—पर यह कैसा जीवन है?आधुनिक साधनों ने मनुष्य को आत्मकेंद्रित बना दिया है। घर में बुजुर्गों के लिए समय नहीं है। विदेशों में बसे बच्चे माता-पिता के अंतिम समय में भी साथ नहीं होते। क्या यही सुख है—सिर्फ पैसा कमाना?
बुजुर्गों का आशीर्वाद जहां न हो, वह सुख कैसा? बच्चों को क्रेच में छोड़ते समय क्या हम उनके भीतर के मौन रोदन को सुन पाते हैं? क्या यही हमारी प्रगति है?खुशी एक सापेक्ष भाव है। क्या कोई जंगल में अकेला खुश रह सकता है? वास्तविक खुशी दूसरों के साथ, उनके सुख-दुख में सहभागी बनकर मिलती है। परोपकार में आत्मिक आनंद निहित है।वह सुख सच्चा नहीं हो सकता, जिसमें और लोग शामिल न हों। किसी के दुख, भूख या पीड़ा को देखकर संवेदनशील व्यक्ति का हृदय द्रवित हो उठता है।सुख का मूलमंत्र यही है—सबके साथ मिलकर सुखी होना। और यह तभी संभव है, जब हम एक संवेदनशील, मानवीय और आदर्श समाज का निर्माण करें।
