मर्यादा की लक्ष्मण रेखा और बिखरते संस्कार: आधुनिक समाज के सामने खड़े यक्ष प्रश्न

Lakshman Rekha of dignity and disintegrating values: Yaksha questions standing before modern society
 
मर्यादा की लक्ष्मण रेखा और बिखरते संस्कार: आधुनिक समाज के सामने खड़े यक्ष प्रश्न

- मनोज कुमार अग्रवाल (विनायक फीचर्स)

आज का भारतीय समाज एक अजीब से संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक तरफ हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हैं, तो दूसरी तरफ हमारे पारंपरिक पारिवारिक और नैतिक मूल्य तेजी से खंडित हो रहे हैं। किशोरावस्था और युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही आज की पीढ़ी कई बार 'बिंदास जीवनशैली' और असीमित स्वतंत्रता को ही असल जिंदगी मान बैठती है। लेकिन जब यह स्वतंत्रता मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघ जाती है, तो उसके परिणाम केवल परिवारों को ही नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था को हिलाकर रख देते हैं।

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पुणे का केतन अग्रवाल हत्याकांड: एक खौफनाक हकीकत

हाल ही में पुणे में घटित केतन विशाल अग्रवाल हत्याकांड ने समाज के उस चेहरे को बेनकाब किया है, जिसे हम अक्सर अनदेखा करने की कोशिश करते हैं। 26 वर्षीय होनहार युवक केतन की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि उसकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर कर दी।

  • साजिश का ताना-बाना: हत्या से ठीक पहले सिया ने केतन के साथ अपने जन्मदिन का जश्न मनाया, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी साझा की गईं ताकि किसी को शक न हो।

  • लोहागढ़ किले में वारदात: ट्रेकिंग के बहाने केतन को लोहागढ़ किले की ऊंचाइयों पर ले जाया गया, जहाँ सिया और उसके प्रेमी चेतन ने मिलकर उसे खाई में धक्का दे दिया।

  • हादसे का ढोंग: वारदात के बाद सिया ने सोशल मीडिया पर सहानुभूति बटोरने के लिए भावुक पोस्ट लिखी। शुरुआत में इसे एक दुर्घटना माना गया, क्योंकि नवंबर में दोनों की जयपुर में 17 करोड़ रुपये के बजट के साथ एक शाही शादी होने वाली थी।

पुलिस जांच और खुलती परतें

जब पुलिस ने मामले की गहराई से जांच की, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:

  1. शादी से पहले प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए दोनों को बाली जाना था, लेकिन ऐन वक्त पर केतन का पासपोर्ट रहस्यमय तरीके से गायब हो गया।

  2. 14 जून को भी लोहागढ़ ट्रेक पर केतन को गिराने की कोशिश हुई थी, पर उसने झाड़ियों को पकड़कर खुद को बचा लिया था। तब सिया ने 'सांप' का बहाना बनाकर बात टाल दी थी।

  3. 18 जून को वारदात के दिन कड़कती गर्मी में भी उनके पास एक संदिग्ध युवक हुडी से चेहरा ढककर चल रहा था, जो कि सिया का प्रेमी चेतन चौधरी था।

आज सिया पुलिस की गिरफ्त में है, लेकिन केतन के पीड़ित परिवार का यह सवाल समाज के सीने में चुभता है—"यदि तुम्हें यह शादी मंजूर नहीं थी, तो अपने माता-पिता से खुलकर मना कर देती; हमारे निर्दोष बेटे की जान लेने की क्या जरूरत थी?"

प्रेम के नाम पर अपराध का बढ़ता चलन

ऐसा ही एक खौफनाक मामला पिछले साल मेघालय में भी देखा गया था, जहाँ सोनम नामक युवती ने शादी के कुछ ही दिनों बाद अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति राजा रघुवंशी की निर्मम हत्या कर दी थी। वास्तव में, ऐसे अपराधियों को 'प्रेमी या प्रेमिका' कहना प्रेम जैसे पवित्र और निश्छल भाव का अपमान करना है। ये सिर्फ और सिर्फ जघन्य अपराध के साझेदार हैं।

इंदौर से लेकर पुणे और मेघालय तक की ये घटनाएं समाज में बढ़ती उस आपराधिक मानसिकता को दर्शाती हैं, जो अपनी गलतियों को छुपाने या अपनी स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी की जान लेने से भी नहीं हिचकिचाती।

सामाजिक बंदिशें बनाम युवाओं का विद्रोह

इस समस्या का एक दूसरा पहलू यह भी है कि आज के प्रगतिशील दौर में भी हमारा समाज बेटियों को अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने या अपनी पसंद जाहिर करने की पूरी आजादी नहीं देता।

  • बेटों की पसंद को समाज आसानी से स्वीकार कर लेता है, लेकिन बेटियों की पसंद को अक्सर 'पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव' या 'पारिवारिक प्रतिष्ठा पर दाग' मान लिया जाता है।

  • पारिवारिक और सामाजिक दबाव में जब लड़कियों की मर्जी के खिलाफ शादी कर दी जाती है, तो वे नए माहौल में तालमेल नहीं बिठा पातीं। ऐसे में कुछ लड़कियां बागी होकर आत्मघाती कदम उठा लेती हैं, और अब तो बात मंगेतर या पति की हत्या तक जा पहुंची है।

अगर सिया और सोनम जैसी युवतियों को बचपन से ही नैतिक मूल्यों, पारिवारिक नियंत्रण और मर्यादा का पाठ पढ़ाया गया होता, तो वे किसी गलत संगत में नहीं फंसतीं। या यदि उनमें इतनी हिम्मत होती कि वे माता-पिता के सामने शादी के फैसले का खुलकर विरोध कर पातीं, तो दो हंसते-खेलते परिवार तबाह होने से बच जाते।

विवाह पूर्व के संबंध और बिखरती वैवाहिक संस्था

केवल लड़कियों को ही कटघरे में खड़ा करना इस गहरी सामाजिक बीमारी का संपूर्ण इलाज नहीं है। हाल के दिनों में नोएडा, भोपाल, कोलकाता और देहरादून से दहेज उत्पीड़न और ससुराल की प्रताड़ना के कारण नवविवाहिताओं की मौत के मामले भी सामने आए हैं।

लेकिन सिक्के का एक कड़वा पहलू यह भी है कि विवाह से पहले अत्यधिक स्वच्छंद और स्वतंत्र जीवन जीने की आदी हो चुकी कुछ लड़कियों को विवाह के बाद की जिम्मेदारियां और मर्यादाएं स्वीकार नहीं होतीं। जब वैवाहिक जीवन में तालमेल नहीं बैठता, तो वे आत्मघाती कदम उठाकर ससुराल वालों को कानूनी पचड़ों में फंसा देती हैं। विवाह पूर्व के अफेयर और नैतिक शुचिता का अभाव आज के दांपत्य जीवन में बढ़ते तनाव का एक बड़ा कारण बन चुका है।

 अब जागने का समय है

भोपाल, नोएडा, इंदौर और पुणे से आने वाली ये खबरें सिर्फ क्राइम बुलेटिन की सुर्खियां नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज के सड़ते हुए ताने-बाने की चेतावनी हैं। अब वक्त आ गया है कि हम शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद करना छोड़ दें।वर्तमान समाज के सामने अब दो ही रास्ते बचे हैं—या तो हम आधुनिकता की आड़ में पनप रहे इस नैतिक पतन और स्वच्छंदता को चुपचाप स्वीकार कर लें, या फिर अपने बच्चों को बचपन से ही संस्कारों की वो थाती सौंपें जो उन्हें मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघने से रोके। फैसला हमारे हाथों में है।

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