भाड़े की भीड़ और यूट्यूबरों का 'लाइव' तमाशा: लोकतंत्र के नाम पर कैसी हो रही है पत्रकारिता?

Hired Crowds and the 'Live' Spectacle of YouTubers: What Kind of Journalism Is Being Practiced in the Name of Democracy?
 
भाड़े की भीड़ और यूट्यूबरों का 'लाइव' तमाशा: लोकतंत्र के नाम पर कैसी हो रही है पत्रकारिता?

(लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी / विनायक फीचर्स)

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन और विरोध के स्वर अब अक्सर 'किराए की भीड़' और 'डिजिटल स्वार्थ' की भेंट चढ़ते दिख रहे हैं। हाल के वर्षों में सार्वजनिक स्थलों पर जुटने वाली ऐसी भीड़, जिसे अपने विरोध का मकसद तक नहीं पता, यूट्यूबरों और कुछ खास पत्रकारों के लिए कमाई और प्रोपेगेंडा का एक बड़ा जरिया बन गई है।

भीड़ नादान, विमर्श तय

अक्सर देखा जाता है कि अफ़वाहों के सहारे जुटाई गई भीड़ के हाथों में अचानक बैनर और विरोध की पट्टियां आ जाती हैं। यह भीड़ नहीं जानती कि वह वहाँ क्यों खड़ी है, लेकिन उनके पास खड़े यूट्यूबरों का 'एजेंडा' बिल्कुल स्पष्ट होता है। वे अपने मोबाइल कैमरों के साथ तैयार रहते हैं ताकि समाज को वही दिखा सकें जो उनके 'आकाओं' या 'सहयोगकर्ताओं' के हित में हो।

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नृत्य और 'बुलबुल' की पत्रकारिता

आलेख में तीखा कटाक्ष करते हुए कहा गया है कि आज के दौर में कुछ लोग 'नाच मेरी बुलबुल' की तर्ज पर पत्रकारिता कर रहे हैं। भीड़ का हिस्सा बनकर अपने मन मुताबिक सवाल करना और फिर मन मुताबिक जवाब न मिलने पर उसे संपादन (Editing) में हटा देना इनकी मजबूरी बन गई है। पत्रकारिता की इस नई दुकान में सत्य को जानना या दिखाना प्राथमिकता नहीं, बल्कि अपने 'आका' को खुश कर उपहार प्राप्त करना मुख्य लक्ष्य हो गया है।

जब आपस में भिड़ जाते हैं यूट्यूबर

दिल्ली के जंतर-मंतर जैसे स्थलों पर कई बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जहाँ यूट्यूबर आपस में ही उलझ जाते हैं। इसके पीछे का कारण केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि अपने संरक्षक के प्रति 'नमक का कर्ज' अदा करना होता है। भीड़ तो भेड़ की तरह आचरण करती है, लेकिन उसे उकसाने और अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने का खेल ये डिजिटल चैनल बखूबी खेल रहे हैं।

भीड़ का वजूद और दिहाड़ी का सच

भीड़ अक्सर नादानी में सच उगल देती है कि उसे भाड़े पर लाया गया है। आलेख के अनुसार, भीड़ की कोई गलती नहीं होती; उसे केवल अपनी 'दिहाड़ी' से सरोकार होता है। भीड़ जानती है कि जब तक वह मौजूद है, तभी तक आंदोलनों का वजूद है और तभी तक यूट्यूबरों की दुकानें भी चमक रही हैं आज के दौर में 'भीड़ और वीडियो' का यह गठजोड़ लोकतंत्र के स्वस्थ विमर्श के लिए एक गंभीर चुनौती है। पत्रकारिता के नाम पर चल रहे इस 'धंधे' में सच कहीं पीछे छूट गया है।

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