श्राद्ध पक्ष में अपनाए जाने वाले मुख्य नियम
Main rules to be followed during Shraadh Paksha
Mon, 8 Sep 2025
(आचार्य राजेश – विभूति फीचर्स)
श्राद्ध पक्ष का समय पितृ तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर माना जाता है। इस अवधि में श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए कर्म, कुल-परिवार के लिए कल्याणकारी सिद्ध होते हैं। नीचे श्राद्ध करते समय ध्यान रखने योग्य प्रमुख नियम दिए जा रहे हैं –
1. गीता पाठ और मंत्र जप
श्राद्ध के दिन भगवद्गीता के सातवें अध्याय का महात्म्य पढ़कर संपूर्ण अध्याय का पाठ करें और उसका फल पितरों को समर्पित करें।
श्राद्ध की शुरुआत और अंत में यह मंत्र तीन बार जपना चाहिए –
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः।।
(अर्थ – देवताओं, पितरों, महायोगियों, स्वधा और स्वाहा – सभी को नित्य प्रणाम है, जो शाश्वत फल प्रदान करते हैं।)
पितृ तृप्ति के लिए एक विशेष मंत्र का उच्चारण अत्यंत लाभकारी है –
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा।
2. श्राद्ध करने का अधिकार
यदि पुत्र न हो तो श्राद्ध दौहित्र (पुत्री का पुत्र) कर सकता है।
कोई उत्तराधिकारी न हो तो पत्नी भी पति का श्राद्ध बिना मंत्रोच्चारण के कर सकती है।
3. पूजन के नियम
गंध रहित धूप का प्रयोग करें।
बिल्व फल और घी का धुआँ श्राद्ध में उपयोग न करें।
यदि पंडित उपलब्ध न हों तो सूर्य नारायण के समक्ष दोनों हाथ उठाकर प्रार्थना करें –
“हे सूर्य देव! मैं (अपना नाम), (पिता का नाम) का पुत्र, (अपना कुल, जाति व गोत्र – अथवा ब्रह्म गोत्र) आपकी शरण में हूँ। कृपया मेरे पितृदेव को तृप्त रखें। इस हेतु मैं आपको अर्घ्य और भोजन अर्पित करता हूँ।”
4. जप और अर्पण
श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन एक माला “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और उसका फल पितरों को अर्पित करें।
5. ब्राह्मण निमंत्रण
श्राद्ध से एक दिन पहले संयमी और योग्य ब्राह्मणों को आमंत्रित करें।
यदि श्राद्ध दिवस पर कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण आएँ, तो उन्हें भी श्रद्धा से भोजन कराना चाहिए।
6. भोजन की व्यवस्था
अन्न स्वादिष्ट, उत्तम प्रकार से पका हुआ और भोजनकर्ता की इच्छा के अनुरूप होना चाहिए।
पात्रों में अन्न परोसने के बाद श्राद्धकर्ता को मधुर वाणी में कहना चाहिए –
“हे महानुभावो! कृपया अपनी इच्छा अनुसार भोजन ग्रहण करें।”
नाम और गोत्र का उच्चारण कर दिया गया भोजन पितरों को उसी प्रकार प्राप्त होता है, जैसा उनके लिए उपयुक्त होता है। (संदर्भ: विष्णु पुराण 3.16,16)
7. विशेष सावधानियाँ
श्राद्धकाल में सात वस्तुओं की शुद्धि आवश्यक है – शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मंत्र और ब्राह्मण।
तीन बातों पर विशेष ध्यान दें – शुद्धि, अक्रोध (क्रोध न करना) और अत्वरा (जल्दबाज़ी न करना)।
मंत्रोच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए। गलत उच्चारण से कर्म निष्फल हो सकते हैं।

