मेडिकल सिस्टम ही बीमार है साहब
मनोज कुमार अग्रवाल | विभूति फीचर्स
तीन-चार दिन के वायरल फीवर ने ऐसा हाल कर दिया कि हुलिया ही बिगड़ गया। ऊपर से इलाज की सबसे बड़ी उलझन बीमारी नहीं, बल्कि यह तय करना हो गई कि किस पैथी से इलाज कराया जाए। एलोपैथी में एमडी बेटी ने वाट्सऐप पर दवाओं की सूची भेज दी तो होम्योपैथिक डॉक्टर बेटी-दामाद ने अपनी पैथी की डोज समझा दी। अब समस्या यह कि जिसकी सलाह न मानूं, वह नाराज हो सकता है और भविष्य में फिर कभी उसकी दवा या सलाह की जरूरत पड़ सकती है!
कहने को बीमारी एक है, लेकिन इलाज की राह कई हैं। होम्योपैथी को लेकर उसके समर्थक कम दुष्प्रभाव की बात करते हैं, जबकि इसकी उपचार गति अपेक्षाकृत धीमी मानी जाती है। आज के दौर में मरीज को बीमारी से ज्यादा जल्दी ठीक होने की चिंता रहती है। एक-दो दिन में आराम न मिले तो वह दूसरी पैथी की ओर रुख कर लेता है। एलोपैथी में भी कई बार उपचार में समय लगता है और दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर डॉक्टर की सलाह महत्वपूर्ण होती है।
जब तीन पुड़िया ही इलाज हुआ करती थीं
हमारी पीढ़ी का जमाना कुछ और था। आयुर्वेद और एलोपैथी का देसी मिश्रण करने वाले डॉक्टर से तीन पुड़िया दवा ले आए और खा लीं—बस इलाज पूरा! डॉक्टर की लिखावट समझने की जरूरत नहीं, दवा की संरचना जानने की जरूरत नहीं और किसी जांच की लंबी सूची भी नहीं।
लेकिन पढ़ी-लिखी डॉक्टर संतानों ने अब मुश्किल बढ़ा दी है। दवा हाथ में आते ही आवाज आती है—“पापा, इसमें यह छोटी-सी गोली दिखाई दे रही है, कहीं यह स्टेरॉयड तो नहीं? यह शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकती है।”मान लिया कि वह दवा हमारे लिए उचित नहीं थी, लेकिन हमारा तर्क भी कम मजेदार नहीं है—“हम तो इसे खाते रहे और ठीक भी होते रहे!”अब हाल यह है कि कई-कई दिन और कई तरह की गोलियां लेने के बाद राहत मिल जाए तो उसे भी भगवान की कृपा मानना पड़ता है। शरीर बीमारी से कम और दवाओं की लंबी सूची देखकर ज्यादा थका हुआ महसूस करता है।
बच्चों की चिंता भी अपनी जगह सही है
वायरल फीवर का नाम लेते ही डॉक्टर बेटी ने कहा—“पापा, सीबीसी टेस्ट करा लीजिए।” मगर हमारी पीढ़ी का जवाब तैयार था—“अरे, मामूली बुखार है, ठीक हो जाएगा।”लेकिन डॉक्टर बच्चे मानते कहां हैं! उन्हें बीमारी की गंभीरता समझने के लिए जांच जरूरी लगती है और हमें लगता है कि हर बीमारी के लिए टेस्ट क्यों कराया जाए?असल में यह दो पीढ़ियों की सोच का अंतर है। हमने सीमित संसाधनों में जीवन देखा है और नई पीढ़ी ने आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ। दोनों के अपने अनुभव हैं।
लालटेन की रोशनी से आधुनिक अस्पताल तक
हम उस पीढ़ी से हैं जिसका जन्म बिना गर्भावस्था के अल्ट्रासाउंड, तमाम आधुनिक जांचों और अत्याधुनिक अस्पतालों के हुआ। गांव-कस्बों में प्रसव कई बार प्रशिक्षित चिकित्सा व्यवस्था के बजाय स्थानीय दाई की मदद से घर पर ही हो जाता था। बिजली हर समय उपलब्ध नहीं थी, एसी और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की तो कल्पना भी नहीं थी।
गर्मियों की तपती रातों में माताएं सीमित सुविधाओं के बीच प्रसव पीड़ा सहती थीं और बच्चे दुनिया में आ जाते थे। उस समय की परिस्थितियों को याद करके आज की सुविधाओं पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान ने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम करने, संक्रमण रोकने और जटिल परिस्थितियों का इलाज करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इसलिए पुरानी व्यवस्था की याद और आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धियों के बीच संतुलित नजरिया जरूरी है।
बाबा नाड़ी देखकर बीमारी समझ लेते थे
मेरे बाबा वैद्य थे। नाड़ी देखकर बीमारी समझने और उपचार करने का उनका अपना अनुभव था। उस समय मरीज और वैद्य के बीच विश्वास का रिश्ता बड़ा मजबूत हुआ करता था। आज चिकित्सा व्यवस्था बेहद जटिल हो गई है। विशेषज्ञ अलग-अलग हैं, जांच अलग-अलग हैं, दवाएं अलग-अलग हैं और अस्पतालों की अपनी प्रक्रियाएं हैं। इसके साथ दवा उद्योग और चिकित्सा व्यवसाय का प्रभाव भी लगातार बढ़ा है।
मरीज के मन में कभी-कभी यह सवाल उठता है कि क्या हर जांच और हर दवा वास्तव में जरूरी है? यही वह जगह है जहां पारदर्शिता और डॉक्टर-मरीज के बीच भरोसा सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।
हर बुखार में एक जैसी दवा क्यों?
व्यंग्यकार के मन में सवाल उठता है कि कई बार बुखार हो तो एक ही तरह की लोकप्रिय दवा क्यों याद आती है? पेट में गैस हो या न हो, एंटासिड क्यों साथ आ जाता है? और जांच कराने के लिए खुली हुई लैब में परीक्षण किस गुणवत्ता मानक पर हो रहा है, इसकी जानकारी आम मरीज को कितनी होती है?
यह सवाल केवल मरीज का नहीं है। चिकित्सा व्यवस्था में दवाओं के विवेकपूर्ण इस्तेमाल, अनावश्यक जांच से बचाव और डायग्नोस्टिक सेवाओं की गुणवत्ता पर लगातार चर्चा होती रही है। मगर मरीज की मजबूरी भी समझिए। जब बीमारी बढ़ती है तो वही व्यक्ति, जो कल तक जांच से बच रहा था, आज डॉक्टर के कहने पर तमाम परीक्षण कराने को तैयार हो जाता है।
दवा उद्योग और मेडिकल सिस्टम
आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में दवा उद्योग की भूमिका बहुत बड़ी है। नई दवाओं का विकास, उत्पादन और वितरण चिकित्सा व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन जब मरीज को यह महसूस होने लगे कि उसके इलाज से ज्यादा किसी व्यावसायिक हित को प्राथमिकता दी जा रही है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हृदय रोग और थायराइड जैसी कई दीर्घकालिक बीमारियों में मरीजों को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ सकती हैं। इसे केवल “दवा उद्योग का ग्राहक बनाए रखने” के नजरिए से देखना चिकित्सा विज्ञान की पूरी तस्वीर नहीं बताता। इन बीमारियों में नियमित उपचार कई मरीजों के लिए गंभीर जटिलताओं को रोकने में महत्वपूर्ण होता है। फिर भी दवा लिखने में पारदर्शिता, मरीज को उपचार के विकल्प समझाना और अनावश्यक दवाओं से बचना चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है।
कोविड के बाद भी सवाल बाकी हैं
कोविड महामारी के बाद वैक्सीन, दवाओं और उपचार को लेकर कई तरह के सवाल और बहसें सामने आईं। किसी भी वैक्सीन या दवा से होने वाले संभावित दुष्प्रभावों का आकलन वैज्ञानिक अध्ययनों, निगरानी तंत्र और विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी मृत्यु को केवल समय के संबंध के आधार पर किसी वैक्सीन से जोड़ देना भी वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। समस्या यही है कि आम आदमी को चिकित्सा संबंधी जटिल आंकड़ों और वैज्ञानिक निष्कर्षों तक पहुंचना आसान नहीं होता। परिणामस्वरूप अफवाह और अविश्वास तेजी से जगह बना लेते हैं।
बीमार सिस्टम का इलाज कौन करेगा?
सवाल यह नहीं है कि एलोपैथी सही है या होम्योपैथी, आयुर्वेद सही है या कोई दूसरी चिकित्सा पद्धति। असली सवाल है—मरीज के हित में सबसे सुरक्षित, प्रभावी और वैज्ञानिक उपचार कैसे सुनिश्चित हो? चिकित्सा व्यवस्था में डॉक्टर की विशेषज्ञता जरूरी है, लेकिन मरीज का भरोसा भी उतना ही जरूरी है। दवा उद्योग की भूमिका जरूरी है, लेकिन पारदर्शिता उससे भी ज्यादा जरूरी है। जांच जरूरी हो सकती है, लेकिन अनावश्यक जांच से बचना भी उतना ही आवश्यक है।
हमारी पीढ़ी पुरानी चिकित्सा व्यवस्था की सादगी को याद करती है और नई पीढ़ी वैज्ञानिक प्रमाणों पर जोर देती है। शायद सही रास्ता इन दोनों के बीच कहीं है—जहां अनुभव का सम्मान हो, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाणों की अनदेखी न हो; आधुनिक सुविधाएं हों, लेकिन मरीज को केवल उपभोक्ता न समझा जाए। आखिर सवाल वही है—जब चिकित्सा व्यवस्था में ही कई सवाल खड़े हो रहे हों, तो इस सिस्टम का इलाज कौन करेगा, साहब?

