खनिज झारखंड का, लेकिन अधिकार और मुनाफा किसका?
कुमार कृष्णन | विनायक फीचर्स
खनिज केवल धरती के भीतर मौजूद कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट या पत्थर नहीं हैं। ये किसी राज्य की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, जमीन और वहां रहने वाले समाज से सीधे जुड़े संसाधन हैं। इसलिए खनिजों पर अधिकार का सवाल केवल कर और राजस्व तक सीमित नहीं है। यह भारतीय संघवाद, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे का भी प्रश्न है। खान एवं खनिज कानून में हालिया बदलावों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड के लिए यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है। राज्य की धरती से बड़ी मात्रा में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य खनिज निकाले जाते हैं, जिनका देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन सवाल यह है कि जिन संसाधनों के आधार पर राष्ट्रीय विकास की इमारत खड़ी होती है, उसका उचित लाभ उन क्षेत्रों और लोगों को कितना मिलता है, जिनकी जमीन, जंगल और पर्यावरण इसकी कीमत चुकाते हैं?
केंद्र के फैसले पर झामुमो की आपत्ति
झामुमो की विस्तारित केंद्रीय समिति की बैठक के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र के फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि राज्यों से पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना खान एवं खनिज से संबंधित कानून में बदलाव उचित नहीं है। उनके मुताबिक इसका सबसे अधिक प्रभाव झारखंड जैसे खनिज-संपन्न राज्यों पर पड़ सकता है।
इसके बाद झारखंड कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को आंदोलन का रूप देने का ऐलान किया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने एमएमडीआर संशोधन विधेयक के जरिए राज्यों के खनिजों पर सेस वसूलने के अधिकार को सीमित किए जाने के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा की है।
कांग्रेस के कार्यक्रम के अनुसार 27 अगस्त को जिला मुख्यालयों पर धरना और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन, 7 सितंबर को लोक भवन के समक्ष राज्यस्तरीय धरना तथा 9 से 16 सितंबर तक प्रखंड मुख्यालयों पर प्रदर्शन प्रस्तावित है।
खनिज राजस्व पर बढ़ी चिंता
कांग्रेस के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में खनिजों से झारखंड को करीब 1,380 करोड़ रुपये तथा 2025-26 में 7,487.91 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। पार्टी का तर्क है कि इस आय का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं में किया जाता है। यदि खनिजों पर सेस लगाने की राज्य की क्षमता सीमित होती है तो इससे राज्य की वित्तीय योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
हालांकि इन आंकड़ों और दावों को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके भी देखने की जरूरत है। मूल प्रश्न यह है कि खनिज-संपदा पर निर्भर राज्य की वित्तीय क्षमता में किसी भी बड़े बदलाव का असर उसकी विकास योजनाओं पर पड़ सकता है। इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच व्यापक संवाद इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
केंद्र का तर्क भी महत्वपूर्ण
दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग लेवी से खनिजों की कीमतों में अंतर पैदा होता है। इससे उद्योगों की लागत बढ़ सकती है और निवेश प्रभावित हो सकता है। महत्वपूर्ण खनिजों की खोज एवं उत्पादन बढ़ाने और देश में अधिक समान खनिज बाजार विकसित करने के लिए कानून में बदलाव को आवश्यक बताया जा रहा है।
यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। भारत को औद्योगिक विकास के लिए खनिज संसाधनों की आवश्यकता है। महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति, उत्पादन में वृद्धि और निवेश का अनुकूल वातावरण राष्ट्रीय आवश्यकता है। लेकिन सवाल तब उठता है जब राष्ट्रीय हित और निवेश के नाम पर राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता कमजोर होने लगे।
असली परीक्षा संघवाद की
सवाल यह नहीं है कि केंद्र को खनिज नीति बनाने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि ऐसी नीति बनाते समय राज्यों को कितना भागीदार बनाया जाता है।
2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से कहा था कि खनन कंपनियों से ली जाने वाली रॉयल्टी कर नहीं है और राज्यों को खनिज अधिकारों तथा खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति है। यह फैसला राज्यों की वित्तीय शक्तियों और केंद्र-राज्य संबंधों की संवैधानिक व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा।
अब कानून में बदलाव को विपक्ष इस फैसले के प्रभाव को सीमित करने के प्रयास के रूप में देख रहा है। संसद को कानून में बदलाव करने का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था में किसी राज्य के अधिकारों को प्रभावित करने वाले बदलाव के व्यापक संघीय प्रभाव पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
खनन का लाभ राष्ट्रीय, कीमत स्थानीय क्यों?
भारत का संघवाद केवल राजनीतिक शक्तियों के बंटवारे तक सीमित नहीं है। यह वित्तीय अधिकारों का भी प्रश्न है। राज्यों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय विकास जैसी जिम्मेदारियां निभानी होती हैं।
खनिज-संपन्न राज्यों की स्थिति और भी जटिल है। खनन से होने वाला लाभ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मिलता है, लेकिन उसका सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव सबसे पहले स्थानीय स्तर पर दिखाई देता है।
जमीन अधिग्रहण, जंगलों पर असर, जलस्रोतों पर दबाव, प्रदूषण, विस्थापन और परिवहन व्यवस्था पर बढ़ता बोझ—ये सभी खनन क्षेत्रों की वास्तविक चुनौतियां हैं।
झारखंड में आदिवासी समाज की जमीन, जंगल और जीवन से जुड़े सवाल लंबे समय से खनन नीति के केंद्र में रहे हैं। इसलिए खनिज नीति को केवल आर्थिक नीति मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संरक्षण भी समान रूप से शामिल होना चाहिए।
स्थानीय युवाओं को क्या मिला?
खनिज विकास का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना स्थानीय रोजगार होना चाहिए। यदि झारखंड की धरती से करोड़ों-अरबों रुपये का खनिज निकलता है, लेकिन उसी क्षेत्र का युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, सूरत, पंजाब या दूसरे राज्यों की ओर पलायन करता है तो विकास के मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
खनिज-संपदा का अर्थ यह होना चाहिए कि खनन क्षेत्र में बेहतर स्कूल और अस्पताल हों, पेयजल उपलब्ध हो, स्थानीय युवाओं को कौशल प्रशिक्षण मिले, उद्योगों में उन्हें रोजगार मिले और विस्थापित परिवारों का सम्मानजनक पुनर्वास हो।
यदि खनिज से मिलने वाला राजस्व स्थानीय लोगों के जीवन की गुणवत्ता में बदलाव नहीं ला पाता, तो खनिज-संपदा का सामाजिक अर्थ अधूरा रह जाता है।
केवल केंद्र बनाम राज्य नहीं है यह विवाद
खनिज अधिकारों की बहस को केवल केंद्र बनाम राज्य के विवाद में सीमित करना भी उचित नहीं होगा। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीय समाज है—किसान, आदिवासी परिवार, मजदूर और स्थानीय युवा।
सहकारी संघवाद इस चुनौती का रास्ता निकाल सकता है। यदि राज्यों की अलग-अलग लेवी से उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है तो केंद्र और राज्य मिलकर ऐसी व्यवस्था तैयार कर सकते हैं जिसमें उद्योगों के लिए लागत का संतुलन बना रहे और राज्यों की वित्तीय जरूरतें भी सुरक्षित रहें।
एकरूपता और केंद्रीकरण एक ही चीज नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर समान नीति बनाई जा सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि राज्यों की वित्तीय शक्तियां पूरी तरह केंद्र के अधीन हो जाएं।
पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी तय हो
खनिज नीति में पर्यावरण का प्रश्न भी केंद्रीय होना चाहिए। खनन के बाद जमीन का पुनर्वास, जलस्रोतों की सुरक्षा, जंगलों की भरपाई और विस्थापित परिवारों का पुनर्स्थापन केवल कागजी प्रावधान नहीं, बल्कि वास्तविक जिम्मेदारी हैं।
इन कार्यों के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। यदि खनिज उत्पादक राज्य के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे तो इन जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से कौन निभाएगा?
संसदीय प्रक्रिया पर भी गंभीर विचार आवश्यक है। जब किसी विधेयक का सीधा असर राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर पड़ता हो तो संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए और प्रभावित राज्यों की चिंताओं को भी पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।
मजबूत भारत के लिए मजबूत राज्य जरूरी
जीएसटी के बाद राज्यों के कई स्वतंत्र कराधिकार पहले ही सीमित हुए हैं। ऐसे में यदि खनिज जैसे महत्वपूर्ण संसाधन पर भी राज्यों की वित्तीय क्षमता कम होती है तो राज्यों में आर्थिक स्वायत्तता को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
केंद्र को राष्ट्रीय हित देखना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय हित का अर्थ राज्यों को कमजोर करना नहीं हो सकता। मजबूत भारत के लिए मजबूत राज्य जरूरी हैं। मजबूत राज्य तभी बनेंगे जब उनके पास अपनी जनता की जरूरतों के मुताबिक विकास योजनाएं चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन हों।
झारखंड कांग्रेस का प्रस्तावित आंदोलन और झामुमो का विरोध आने वाले दिनों में इस मुद्दे को राज्य की राजनीति में और महत्वपूर्ण बना सकता है। लेकिन राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी यह भी है कि बहस को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रखें। उन्हें यह भी बताना होगा कि राज्यों के अधिकारों की रक्षा करते हुए निवेश, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय खनिज सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सवाल सिर्फ सेस का नहीं, हिस्सेदारी का है
खनिज देश की संपत्ति है, लेकिन खनिज-संपन्न क्षेत्र केवल खनिज निकालने की जगह नहीं हैं। वे लोगों का घर हैं। इसलिए खनिज नीति का अंतिम पैमाना केवल उत्पादन या कंपनियों का मुनाफा नहीं हो सकता।
यह देखना होगा कि स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला या नहीं, विस्थापित परिवारों का जीवन बेहतर हुआ या नहीं, खनन प्रभावित गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति सुधरी या नहीं और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई हुई या नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जिस समाज ने अपनी जमीन और संसाधन दिए, उसे उस संपदा में उचित हिस्सेदारी कितनी मिली?
खनिज जमीन के नीचे पड़ा निष्क्रिय धन नहीं है। वह वर्तमान के साथ आने वाली पीढ़ियों की भी संपत्ति है। इसलिए उसका उपयोग ऐसा होना चाहिए जिससे राष्ट्रीय विकास और स्थानीय न्याय दोनों सुनिश्चित हों।
खनिज यहां निकले, पर्यावरणीय कीमत यहां चुकाई जाए, मुनाफा कहीं और जाए और स्थानीय युवा रोजगार के लिए बाहर चले जाएं—इसे विकास का सफल मॉडल नहीं कहा जा सकता।
भारत को ऐसी खनिज नीति की जरूरत है जिसमें राष्ट्रीय हित, राज्यों के अधिकार और स्थानीय समाज का न्याय साथ-साथ चलें। केंद्र को निवेश और उत्पादन की स्थिरता चाहिए, राज्यों को वित्तीय स्वायत्तता और खनिज क्षेत्रों के लोगों को अपने संसाधनों में हिस्सेदारी।
इसलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि खनिज पर सेस कौन लगाएगा? असली सवाल यह है कि खनिज से पैदा होने वाली संपदा का न्यायपूर्ण हिस्सा किसे मिलेगा?
झारखंड की धरती से खनिज निकलता है। झारखंड पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत चुकाता है। ऐसे में झारखंड के लोगों का यह सवाल पूरी तरह जायज है कि विकास की उस संपदा में उनका हिस्सा कितना है?

