सदी की भूल: 25 दिन का युद्ध, 200 अरब डॉलर का स्वाहा और खतरे में खाड़ी का अस्तित्व
(विशेष विश्लेषण: ओंकारेश्वर पांडेय)
नई दिल्ली | 25 मार्च 2026
अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े युद्ध को 25 दिन बीत चुके हैं, लेकिन परिणाम उम्मीदों के ठीक उलट नजर आ रहे हैं। जो अमेरिका 28 फरवरी को 'बातचीत का समय समाप्त' होने का दावा कर रहा था, वह आज मध्यस्थों की तलाश में है। यह युद्ध न केवल आर्थिक रूप से विनाशकारी साबित हो रहा है, बल्कि इसने खाड़ी देशों के बुनियादी अस्तित्व (पानी और बिजली) पर भी संकट खड़ा कर दिया है।
युद्ध के 25 दिन: प्रमुख आंकड़े और प्रभाव
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भारी आर्थिक नुकसान: पेंटागन के अनुसार, 24 मार्च 2026 तक अमेरिका इस युद्ध में 200 अरब डॉलर से अधिक खर्च कर चुका है। युद्ध की दैनिक लागत 1 से 2 अरब डॉलर के बीच है।
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सैन्य क्षति: अब तक 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं और 200 से अधिक घायल हैं। साथ ही, MQ-9 रीपर और F-15 जैसे 16 विमान नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए हैं।
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मानवीय त्रासदी: ईरान में 82 हजार से अधिक इमारतों को नुकसान पहुँचा है और हजारों जानें जा चुकी हैं।
रणनीति या राजनीतिक ढाल?
लेखक सवाल उठाते हैं कि क्या यह युद्ध 'एप्सटीन फाइल्स' (Epstein Files) के विवाद को दबाने के लिए एक 'इंफॉर्मेशन वॉरफेयर' का हिस्सा था? फरवरी 2026 में इन फाइलों के सार्वजनिक होने से पहले ही युद्ध की शुरुआत ने कई संदेह पैदा किए हैं। अमेरिका ने बिना संयुक्त राष्ट्र या नाटो के समर्थन के, अकेले ही इस युद्ध का फैसला लिया, जिसका आधार 'तत्काल परमाणु खतरा' बताया गया था—जिसका सबूत IAEA के पास भी नहीं था।
'वॉटर वॉर' और हार्मुज़ का संकट
यह युद्ध अब हथियारों से आगे बढ़कर पानी और बिजली पर आ गया है
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जलापूर्ति पर हमला: ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने उसके अलवणीकरण संयंत्रों (Desalination plants) को निशाना बनाया है। जवाब में ईरान ने चेतावनी दी है कि वह उन क्षेत्रीय देशों के ऊर्जा ढांचों को निशाना बनाएगा जो अमेरिकी ठिकानों को बिजली देते हैं।
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हार्मुज़ जलडमरूमध्य: दुनिया की 20% तेल आपूर्ति का रास्ता अब ईरान के नियंत्रण में है। ईरान ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर 'टोल प्लाज़ा' की तरह शुल्क लगाने और अमेरिकी जहाजों को रोकने की नीति अपनाई है। वर्तमान में यहाँ 400 से अधिक जहाज फंसे हुए हैं।
वैश्विक समीकरण और भारत की भूमिका
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अकेला पड़ा अमेरिका: इस युद्ध में अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों (यूके, फ्रांस, जर्मनी) से सक्रिय समर्थन नहीं मिला। रूस और चीन इस स्थिति का लाभ उठाकर अपना आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव बढ़ा रहे हैं।
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भारत की 'रणनीतिक चुप्पी': प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक कर भारत की खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। भारत ने फिलहाल इस संघर्ष में 'रणनीतिक चुप्पी' साधी हुई है।
नैतिकता का पतन
लेखक के अनुसार, यह युद्ध 'सेंचुरी ब्लंडर' (सदी की भूल) है। वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक की तरह यहाँ भी अमेरिका बिना किसी 'एग्जिट प्लान' के उलझ गया है। युद्ध ने न केवल भौतिक ढांचे को तोड़ा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साख और नैतिकता को भी गहरी चोट पहुँचाई है। अंततः, जो बात बिगड़ी है, वह केवल 'ठोस और ईमानदार बातचीत' से ही बन सकती है।

