भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है श्रावण मास, श्रद्धा से पूजा करने पर मिलती है विशेष कृपा

The month of Shravan is extremely dear to Lord Shiva; worshipping with devotion brings special blessings.
 
भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है श्रावण मास, श्रद्धा से पूजा करने पर मिलती है विशेष कृपा

(अंजनी सक्सेना—विभूति फीचर्स)

श्रावण मास को भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष और पवित्र माना गया है। सनातन परंपरा में मान्यता है कि इस महीने भगवान शिव की पूजा-अर्चना, जलाभिषेक, सोमवार व्रत और महामृत्युंजय मंत्र के जाप का विशेष महत्व है। शिव महापुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में श्रावण मास की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए श्रावण मास में कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण श्रावण में शिव-पार्वती की आराधना को विशेष फलदायी माना जाता है।

शास्त्रों में श्रावण को सभी महीनों में श्रेष्ठ बताया गया है। इस मास के महत्व को सूर्य और चंद्रमा से जुड़े धार्मिक संदर्भों से भी जोड़ा जाता है। श्रवण नक्षत्र के साथ संबंध और इस महीने की धार्मिक कथाओं को सुनने की परंपरा के कारण भी इसे श्रावण नाम मिलने की मान्यता प्रचलित है।

समुद्र मंथन और नीलकंठ महादेव

श्रावण मास से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन की कथा प्रमुख है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला, जिसकी तीव्रता से देवता और दानव चिंतित हो उठे। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए।

कहा जाता है कि विष की गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर गंगाजल अर्पित किया। इसी धार्मिक विश्वास के कारण श्रावण में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई। भक्त जल, दूध और पंचामृत से भगवान शिव का अभिषेक कर उन्हें बिल्वपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं।

पार्थिव शिवलिंग पूजन की परंपरा

श्रावण में पार्थिव शिवलिंग की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की थी। उनकी इसी कठोर साधना और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।

इसी परंपरा के तहत आज भी अनेक श्रद्धालु श्रावण मास में घरों और मंदिरों में मिट्टी के शिवलिंग बनाकर उनका विधिवत पूजन करते हैं। भक्त जलाभिषेक के साथ बिल्वपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित करते हैं।

श्रावण सोमवार का विशेष महत्व

श्रावण मास में सोमवार के व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। भगवान शिव को सोमवार प्रिय होने की धार्मिक मान्यता के चलते भक्त इस दिन उपवास रखकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और शिव मंत्रों का जाप करते हैं।

कई श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति, पारिवारिक सुख-शांति और मानसिक संतोष की कामना से श्रावण के सभी सोमवारों का व्रत रखते हैं। धार्मिक परंपरा में सोमवार को शिव आराधना के लिए विशेष दिन माना गया है।

मंगलागौरी पूजन की भी परंपरा

श्रावण के मंगलवार को माता पार्वती के मंगलागौरी स्वरूप की पूजा का विधान भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। विशेष रूप से महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के लिए मंगलागौरी पूजन करती हैं।

श्रावण मास चातुर्मास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। देवशयनी एकादशी के बाद भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने की धार्मिक मान्यता के बीच इस अवधि में भगवान शिव की आराधना का महत्व और बढ़ जाता है।

जलाभिषेक से लेकर पंचामृत स्नान तक

श्रावण में भक्त भगवान शिव को जल, दूध, दही, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से स्नान कराते हैं। इसके बाद बिल्वपत्र, धतूरा, आक के पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।

धार्मिक मान्यता में बिल्वपत्र को भगवान शिव का प्रिय माना गया है। भक्त श्रद्धापूर्वक बिल्वपत्र अर्पित कर भगवान शिव से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

महामृत्युंजय मंत्र और पंचाक्षर मंत्र

श्रावण मास में महामृत्युंजय मंत्र के जाप की भी विशेष परंपरा है—

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”

इसके अलावा भगवान शिव का पंचाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय” भी श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। धार्मिक विश्वास है कि नियमित जाप से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से मजबूत होता है।

भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है, अर्थात वे थोड़ी-सी श्रद्धा से भी प्रसन्न होने वाले देवता हैं। यही कारण है कि शिव पूजा में अत्यधिक वैभव के बजाय सच्ची श्रद्धा और भक्ति को अधिक महत्व दिया जाता है।

शिव आराधना में समाहित है प्रकृति और समरसता का संदेश

भगवान शिव का स्वरूप प्रकृति और समरसता का प्रतीक भी माना जाता है। उनका वाहन नंदी है, माता पार्वती का वाहन सिंह, भगवान गणेश का वाहन मूषक और भगवान कार्तिकेय का वाहन मयूर है। शिव के गले में सर्प सुशोभित होता है।

पौराणिक दृष्टि से स्वभाव में एक-दूसरे के विपरीत माने जाने वाले इन जीवों का शिव परिवार में साथ रहना सह-अस्तित्व और संतुलन का संदेश देता है। भगवान शिव का स्वरूप यह प्रेरणा देता है कि प्रकृति के विभिन्न रूपों के बीच भी संतुलन और मैत्री कायम रखी जा सकती है।

श्रावण मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, सेवा और सद्भाव का अवसर भी है। सावन की वर्षा जहां प्रकृति को नई ऊर्जा देती है, वहीं शिव आराधना मनुष्य को भीतर से शांत और सकारात्मक बनने की प्रेरणा देती है।

इस पवित्र मास में भगवान शिव की आराधना के साथ प्रेम, करुणा, संयम और आपसी भाईचारे का संकल्प लिया जाए तो यही श्रावण की साधना का वास्तविक संदेश बन सकता है। श्रद्धा और भक्ति से पूजे जाने वाले भोलेनाथ सभी के जीवन में शांति, सद्भाव और मंगल की भावना जागृत करें।

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