भारतीय राजनीति का नया ट्रेंड: दलबदल का खेल और 'तलाक' संस्कृति
(पंकज शर्मा"तरुण"-विनायक फीचर्स) पारंपरिक रूप से 'तीन तलाक' का मुद्दा मुस्लिम समाज में पति-पत्नी के बीच आपसी अलगाव से जुड़ा रहा है। तकनीक के दौर में इसका ऐसा दुरुपयोग भी देखा गया जहां फोन कॉल या एक एसएमएस पर रिश्ते खत्म कर दिए गए। हालांकि, अब कानूनन इस पर रोक लग चुकी है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस 'तलाक' संस्कृति का एक नया और आधुनिक रूप अब भारतीय राजनीति के गलियारों में तेजी से पैर पसार रहा है। राजनीति के इस खेल को कभी 'ऑपरेशन लोटस' तो कभी 'ऑपरेशन गिरगिट' जैसे दिलचस्प नामों से नवाजा जाता है। आइए समझते हैं कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे में यह राजनीतिक 'तलाक' कैसे काम कर रहा है।
1. जब नेताओं ने बदला अपना 'सफरनामा'
राजनीतिक निष्ठा बदलने की शुरुआत तब और दिलचस्प हो गई जब कयासों के विपरीत 'आप' (आम आदमी पार्टी) के कई सांसदों ने नेतृत्व से दूरी बना ली और सत्ताधारी गठबंधन (NDA) का दामन थाम लिया। इसके बाद बगावत का यह सिलसिला दूसरे राज्यों में भी आग की तरह फैल गया।
पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई नेता और सांसद केंद्रीय नेतृत्व से किनारा कर एनडीए के पाले में जा खड़े हुए। स्थिति ऐसी हो गई कि आलोचक मजाकिया लहजे में टीएमसी का नया नामकरण करने लगे। एनडीए के लिए यह स्थिति बेहद मुफीद साबित हुई, जहां बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के उनके कुनबे में सांसदों की संख्या बढ़ती गई।
दीदी और कांग्रेस का गठबंधन
जब बंगाल की राजनीति में दरारें दिखीं, तो ममता बनर्जी ने एक बार फिर कांग्रेस का रुख किया। राजनीति में कोई स्थाई दुश्मन नहीं होता, इसीलिए सोनिया गांधी ने भी पुरानी कड़वाहट भूलकर उनका स्वागत किया। जो नेता कल तक विपक्ष के साथ थे, वे अचानक पाला बदलकर सत्ता के करीब आ गए। इसके पीछे पुराने नेताओं का यह तर्क भी रहा कि पार्टी के भीतर कुछ युवा चेहरों के अहंकार और व्यवहार से वे आहत थे।
2. अवसरवाद या राजनीतिक मजबूरी?
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इन नेताओं की ऐसी क्या मजबूरी होती है कि चुनाव नतीजों से ठीक पहले तक जिस विचारधारा को वे कोस रहे थे, नतीजे आते ही उसी की गोदी में जा बैठते हैं?
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दबाव और सुरक्षा का खेल: कई नेताओं के लिए पाला बदलना केंद्रीय एजेंसियों की जांच और भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने का एक सुरक्षित रास्ता बन जाता है।
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महाराष्ट्र का सियासी ड्रामा: ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में भी देखने को मिला, जहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना के विधायकों और सांसदों ने पाला बदलकर शिंदे गुट का निर्माण किया। नैतिकता की सीमाओं को लांघकर विरोधी खेमे में शामिल होने का यह जज्बा अब राजनीति में आम बात हो चुका है।
3. क्या राजनीति 'जंगल राज' के नियमों पर चल रही है?
यदि दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें, तो कुछ लोग इसे लोकतंत्र का एक व्यावहारिक रूप भी मान सकते हैं। जैसे किसी व्यक्तिगत रिश्ते में पटरी न बैठने पर अलग होने का अधिकार होता है, वैसे ही नेता भी अपने फायदे के लिए नया साथी चुन रहे हैं। प्रकृति का नियम भी यही कहता है कि जो शक्तिशाली है, वही टिकेगा और कमजोर को मैदान छोड़ना पड़ेगा। जब राजनैतिक परिदृश्य ही एक 'जंगल' की तरह हो चला है, तो वहां प्रकृति के ये नियम लागू होना स्वाभाविक है।
विपक्ष के लिए एक मुफ्त सलाह
जिस तेजी से विपक्ष के नेता सत्ता पक्ष में शामिल हो रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि आने वाले दशकों में देश विपक्ष-मुक्त होने की राह पर चल पड़ेगा। ऐसे में आज के विपक्षी नेताओं के सामने दो ही विकल्प बचते हैं:
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या तो वे भी हवा का रुख देखकर पाला बदल लें।
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या फिर राजनीति को अलविदा कहकर किसी सुरक्षित और मुनाफे वाले व्यवसाय में हाथ आजमाएं।
सुरक्षित और मुनाफे वाले करियर विकल्प:
इंफ्रास्ट्रक्चर और सड़कों के ठेके लेना
निजी यूनिवर्सिटी या मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना
सीमेंट, लोहा या बड़े कारखानों का संचालन
धार्मिक ट्रस्टों में मानद पद संभालना
इन व्यवसायों में न तो ईडी (ED) का डर रहेगा और न ही कोई आपसे राजनीतिक वफादारी का सबूत मांगेगा। यहाँ आपका करियर और कमाई दोनों पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे, और कोई भी आपको 'तलाक' नहीं कह पाएगा।

