वैश्विक सहिष्णुता का मार्ग शस्त्रों से नहीं, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से ही संभव
(लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स)
धर्म और आस्था मानवीय चेतना के आधार स्तंभ रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि व्याख्याओं और उत्तराधिकार के मतभेदों ने एक ही विचार को कई धाराओं में बांट दिया। लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव (जो वर्तमान में लंदन में हैं) ने मध्य-पूर्व के संकट और वैश्विक शांति के संदर्भ में एक गहरा विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
धार्मिक धाराओं का इतिहास और विभाजन
लेखक के अनुसार, दुनिया के हर बड़े धर्म में समय के साथ उप-संप्रदाय विकसित हुए हैं। चाहे वह ईसाइयत में 'कैथोलिक' और 'प्रोटेस्टेंट' हों, बौद्ध धर्म में 'हीनयान' और 'महायान' हों, या जैन धर्म में 'दिगंबर' और 'श्वेतांबर'।
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इस्लाम का संदर्भ: इस्लाम में 'सुन्नी' और 'शिया' धाराओं का विभाजन पैगंबर मोहम्मद के बाद उत्तराधिकार के प्रश्न पर हुआ।
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जनसांख्यिकी: सुन्नी समुदाय (करीब 85-90%) मुख्य रूप से इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मिस्र में केंद्रित है, जबकि शिया समुदाय ईरान, इराक और अजरबैजान जैसे देशों में प्रमुखता से है।
धार्मिक मतभेद बनाम क्षेत्रीय वर्चस्व
लेख में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में ईरान और मध्य-पूर्व के संघर्ष केवल धार्मिक नहीं, बल्कि 'क्षेत्रीय वर्चस्व' की लड़ाई हैं।
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शक्ति संतुलन: ईरान शिया जगत की शक्ति का केंद्र है, तो सऊदी अरब सुन्नी जगत का। इनके बीच का तनाव सीरिया, यमन और इराक तक फैला हुआ है।
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कूटनीति की उम्मीद: 1990 के दशक का 'अकबा समझौता' और 2023 में चीन की मध्यस्थता से बहाल हुए राजनयिक संबंध यह बताते हैं कि संवाद से बड़ी दरारें भी भरी जा सकती हैं।
शांति का मार्ग और भारत की मिसाल
लेखक ने वैश्विक शांति के लिए कुछ अनिवार्य सुझाव दिए हैं:
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धर्म और राजनीति का अलगाव: जब तक राजनेता धार्मिक भावनाओं को युद्ध के लिए उकसाएंगे, शांति असंभव है।
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वैश्विक शक्तियों की भूमिका: लेखक ने खेद जताया कि कुछ शक्तिशाली लोकतांत्रिक देशों के नेता शांति स्थापित करने के बजाय अपने राजनीतिक लाभ के लिए युद्ध भड़काने में अधिक प्रभावी दिखते हैं।
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भारत एक उदाहरण: भारत पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है, जहाँ शिया और सुन्नी समुदाय सदियों से आपसी भाईचारे और सह-अस्तित्व के साथ रह रहे हैं।

