आपदा में अवसर तलाशने की राजनीति घातक

The politics of seeking opportunity in disaster is dangerous.
 
र्तमान समय में Israel, United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है

(डॉ. सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स)

अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का प्रभाव आज पूरे विश्व पर पड़ता है। किसी भी क्षेत्र में युद्ध या तनाव की स्थिति बनने पर उसकी आंच वैश्विक अर्थव्यवस्था, कूटनीतिक संबंधों और आम जनजीवन तक महसूस की जाती है। वर्तमान समय में Israel, United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है। ऐसे समय में प्रत्येक देश अपनी विदेश नीति और आर्थिक रणनीति अपने नागरिकों के हितों को ध्यान में रखकर तय करता है।

स्वस्थ लोकतंत्र की यही अपेक्षा भी होती है कि संकट या युद्ध जैसी परिस्थितियों में सभी राजनीतिक दल और नागरिक अपने मतभेदों को भुलाकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रीय नीतियों का समर्थन करना और देश के साथ मजबूती से खड़ा होना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाता है।

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दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में कई बार इसके विपरीत प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं। संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के कारण कुछ दल सरकार को घेरने और उसे बदनाम करने का अवसर तलाशते रहते हैं। वे सरकार के साथ मिलकर संकट से निपटने की बजाय राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं।

हालिया अंतरराष्ट्रीय तनाव के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति और कीमतों को लेकर देश में चिंता का माहौल बना है। लेकिन इस स्थिति को लेकर कुछ राजनीतिक दलों द्वारा अफवाहों और आशंकाओं को हवा देने के प्रयास भी किए गए। अचानक एलपीजी गैस सिलेंडरों की कमी की चर्चाओं के कारण कई जगहों पर लोगों को गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में खड़ा देखा गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष जिम्मेदार भूमिका निभाता, तो वह जनता के बीच भय या भ्रम का वातावरण पैदा करने के बजाय सरकार के साथ मिलकर समाधान खोजने की कोशिश करता। संसद से लेकर सड़कों तक सरकार विरोधी विमर्श को बढ़ाने की बजाय राष्ट्रीय एकता और संयम का संदेश दिया जाना अधिक उचित होता।

यह भी विचारणीय है कि जिन राजनीतिक दलों की जनाधार वाली जमीन लगातार कमजोर हुई है, वे क्या वास्तव में जनहित के मुद्दों को लेकर गंभीर हैं। यदि जनहित सर्वोपरि होता, तो राजनीतिक दोहरेपन के कारण बार-बार चुनावी पराजय का सामना शायद न करना पड़ता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जब देश वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा हो, तब राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जाए। संकट की घड़ी में एकजुटता ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। ऐसे समय में आपदा में अवसर तलाशने की राजनीति न केवल अनुचित है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता के लिए भी घातक सिद्ध हो सकती है।

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