बच्चों के सपनों पर भारी पड़ता जेईई नीट का दबाव

The Pressure of JEE and NEET Weighs Heavily on Children's Dreams
 
बच्चों के सपनों पर भारी पड़ता जेईई नीट का दबाव

अंजनी सक्सेना - विभूति फीचर्स

भारत में इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं अब केवल प्रतियोगी परीक्षाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि लाखों छात्रों और उनके परिवारों के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक दबाव का कारण बनती जा रही हैं। हर वर्ष करोड़ों सपने जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमते हैं, लेकिन सीमित सीटों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इन परीक्षाओं को बच्चों के लिए तनाव और असुरक्षा का पर्याय बना दिया है।

देशभर में लाखों विद्यार्थी आईआईटी और मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की उम्मीद में वर्षों तक कठिन तैयारी करते हैं। लेकिन सीटों की संख्या बेहद सीमित होने के कारण अधिकांश छात्रों को निराशा का सामना करना पड़ता है। इस दौरान केवल पढ़ाई का दबाव ही नहीं, बल्कि परीक्षा केंद्रों पर होने वाली सख्त जांच, लंबी प्रक्रियाएं और असहज नियम भी विद्यार्थियों को मानसिक रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

परीक्षा केंद्रों पर ड्रेस कोड और सुरक्षा जांच के नाम पर कई बार छात्रों, विशेषकर छात्राओं, को असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में बालों की क्लिप, आभूषण, कपड़ों के बटन और अन्य वस्तुओं को हटाने जैसी घटनाएं सामने आती हैं, जिससे बच्चों का आत्मविश्वास प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नकल रोकने के उपाय जरूरी हैं, लेकिन उनकी प्रक्रिया मानवीय गरिमा के अनुरूप होनी चाहिए।

दूसरी ओर, कोचिंग उद्योग भी तेजी से एक बड़े व्यवसाय में बदल चुका है। कोटा, सीकर, हैदराबाद, लखनऊ और अन्य शहरों में लाखों छात्र भारी फीस देकर कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। कई परिवार बच्चों की तैयारी के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने को मजबूर हैं। इसके बावजूद सफलता केवल कुछ चुनिंदा छात्रों को ही मिल पाती है, जबकि बाकी छात्र लगातार दबाव और आत्मग्लानि का सामना करते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि किशोरावस्था में बच्चों को पर्याप्त नींद, खेलकूद और मानसिक संतुलन की आवश्यकता होती है, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे विद्यार्थियों की दिनचर्या अक्सर 12 से 15 घंटे की पढ़ाई तक सीमित होकर रह जाती है। इसका असर उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर दिखाई देने लगा है। तनाव, अनिद्रा, सिरदर्द और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

नीट और जेईई परीक्षाओं को लेकर पारदर्शिता पर भी सवाल उठते रहे हैं। पेपर लीक, उत्तर कुंजी में त्रुटियां और परीक्षा के विभिन्न शिफ्टों में कठिनाई स्तर को लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों में असंतोष देखा गया है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि एक ही परीक्षा के आधार पर बच्चों का भविष्य तय करना उचित नहीं है।

शिक्षाविदों का सुझाव है कि इन परीक्षाओं को वर्ष में कई बार आयोजित किया जाना चाहिए ताकि छात्रों को एक दिन की खराब परिस्थिति के कारण नुकसान न उठाना पड़े। साथ ही बोर्ड परीक्षाओं को अधिक महत्व देने और स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।

यह भी जरूरी है कि छात्रों को यह समझाया जाए कि सफलता केवल आईआईटी या मेडिकल कॉलेज तक सीमित नहीं है। देश में विज्ञान, शोध, कृषि, कानून, डिजाइन, सामाजिक विज्ञान और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी शानदार करियर की संभावनाएं मौजूद हैं।

प्रतियोगी परीक्षाएं विद्यार्थियों के भविष्य का रास्ता जरूर तय करती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य बच्चों को मानसिक रूप से तोड़ना नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी बने, जहां प्रतिस्पर्धा के साथ संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी कायम रहे, ताकि देश का भविष्य स्वस्थ, आत्मविश्वासी और संतुलित बन सके।

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