सवाल घूसखोर शिरोमणि होने का

The question of being the crown prince of bribery
 
Nenene
(सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
कॉम्पिटिशन हर क्षेत्र में है। मलाईदार पदों के लिए प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ घूसखोर चरित्र का होना भी आज अनिवार्य योग्यता बन चुका है। मौजूदा दौर में बिना घूसखोरी के किसी भी पद पर टिके रहना आसान नहीं रह गया है। ईमानदार अधिकारी को उसके सहायक और अधीनस्थ कुर्सी पर अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाते, इसलिए उसके स्थानांतरण की फेहरिस्त हमेशा लंबी बनी रहती है।

Ndndnr

वैसे भी जीवन के किसी भी क्षेत्र में ऊँचा मुकाम हासिल करना हँसी-खेल का विषय नहीं है। करोड़ों रुपये का माल हजम करने वाले, अल्प समय में साइकिल से वायुयान तक और झोपड़ी से ऊँची अट्टालिकाओं तक का सफर तय करने वाले लोग खुद को घूसखोर की श्रेणी में नहीं गिनते। फिर भी घूसखोरी ऐसा रोग है, जो सबसे अधिक सरकारी क्षेत्र में ही फलता-फूलता है। निजी क्षेत्रों में इसी को ‘कमीशनखोरी’ की संज्ञा दी जाती है।

बहरहाल, घूसखोरी में भी अब ‘घूसखोर शिरोमणि’ की पहचान जातीय आधार पर कर ली गई है। यह मैं नहीं कहता, किसी फिल्म का शीर्षक कहता है। लोग उबल रहे हैं कि उनकी बिरादरी को घूसखोरी का शिरोमणि क्यों बताया जा रहा है। असली घूसखोर इसलिए परेशान हैं कि उनकी घूसखोरी को अब तक ‘घूसखोर शिरोमणि’ का दर्जा क्यों नहीं मिला।
मैंने जब से होश संभाला है, घूसखोरी को भारतीय चरित्र में गहराई से शामिल पाया है। सरकारी अस्पताल हो या बिजली विभाग, यातायात कार्यालय हो या कोई अन्य विभाग—जहाँ किसी के बिल पास करने या सरकारी धन की बंदरबाँट का अधिकार हो—वहाँ
कार्यप्रणाली लगभग एक-सी है। फाइलें तब तक आगे नहीं बढ़तीं, जब तक ‘सुविधा शुल्क’ के नाम पर उनमें घूस के पहिए न लग जाएँ।
यूँ तो ‘भ्रष्टाचार-मुक्त शासन’ के विज्ञापन पट कार्यालयों में चमकते रहते हैं, लेकिन भीतर बैठे अधिकारी उनकी परवाह नहीं करते। कुर्सी पर बैठते ही हथेलियाँ खुजलाने लगती हैं। फरियादी अपनी समस्या लेकर आता है और अधिकारी बिना सुने ही हथेली की खुजलाहट से उसे स्थिति समझा देता है—साथ ही यह संकेत भी कि बिना बोहनी के कार्यालय में दिन की शुरुआत नहीं होती। मजबूर फरियादी बोहनी कराता है, तब कहीं जाकर वह अपनी फरियाद रखने लायक बन पाता है।
समस्या एक हो तो गिनाई जाए। घूसखोरी का चलन इतना बढ़ चुका है कि यदि कोई अधिकारी बिना घूस लिए समस्या समाधान का आश्वासन दे, तो फरियादी खुद उस पर विश्वास नहीं करता। घूसखोरी के इस युग में ईमानदार वही कहलाता है, जिसे घूस लेने का अवसर ही नहीं मिला।
दिलचस्प यह भी है कि घूसखोरों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा नहीं होती। जो काम जिसकी सीट का है, घूस पर अधिकार भी उसी का माना जाता है। फिर भी बदनाम केवल एक खास जाति का कर्मचारी ही होता है। कार्यालयों में कार्यरत लगभग सभी अधिकारी और कर्मचारी घूसखोरी में लिप्त प्रतीत होते हैं, किंतु ‘शिरोमणि’ का तमगा किसी और को ही मिलता है। इस विशेषण से वंचित लोग इसे अपना दुर्भाग्य मानते हैं और मन ही मन अपनी ‘कमी’ पर दुखी होते हैं।
आज घूसखोरी अधिकार का रूप लेती जा रही है। पर्याप्त घूस न मिलने पर फाइलों के गायब होने की कहानियाँ आए दिन सुर्खियों में रहती हैं। कुछ घूसखोर तो घूस लेकर गर्व से स्वयं को ‘घूसखोर शिरोमणि’ घोषित करते हैं। उनका साफ मत होता है—यदि कभी पकड़े भी गए, तो घूस देकर छूट जाएँगे।
ऐसे में, जहाँ घूसखोरी अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है, वहाँ केवल किसी एक व्यक्ति या जाति को घूसखोर कहना बाकी घूसखोरों की योग्यता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कॉम्पिटिशन का परिणाम गहन सर्वेक्षण, निष्पक्ष मूल्यांकन और पारदर्शिता के साथ निकाला जाना चाहिए।

Tags