जातिगत भेदभाव का सवाल: सामाजिक वास्तविकता और कानून के दुरुपयोग के बीच बहस

सामाजिक समरसता के साथ कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल पर भी हो गंभीर विमर्श
 
जातिगत भेदभाव का सवाल: सामाजिक वास्तविकता और कानून के दुरुपयोग के बीच बहस

(डॉ. सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)

जातिगत भेदभाव और छुआछूत भारतीय समाज के इतिहास से जुड़ा एक गंभीर विषय रहा है। संविधान ने समानता और सामाजिक न्याय को मूल आधार बनाया तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष कानूनी प्रावधान किए गए। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य उन लोगों को संरक्षण देना है, जिन्हें सामाजिक भेदभाव और अत्याचार का सामना करना पड़ता है।

लेकिन किसी भी कानून की प्रभावशीलता के साथ उसके निष्पक्ष और जिम्मेदार इस्तेमाल का प्रश्न भी जुड़ा होता है। इसी संदर्भ में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के कथित दुरुपयोग को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। लेखक के मत में इस विषय पर भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय तथ्यों और कानून की कसौटी पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।

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कानून का उद्देश्य और उसके इस्तेमाल के बीच संतुलन जरूरी

SC/ST Act का मूल उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को अत्याचारों से संरक्षण प्रदान करना है। ऐसे कानून की आवश्यकता को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि कुछ मामलों में इसके दुरुपयोग के आरोप सामने आए हैं।

दूसरी ओर, यदि किसी मामले में शिकायत गलत पाई जाती है या कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल निजी विवाद, दबाव अथवा राजनीतिक लाभ के लिए किए जाने के प्रमाण सामने आते हैं, तो ऐसी स्थिति में निष्पक्ष जांच और न्यायिक परीक्षण भी उतना ही आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां अदालत ने आरोपों और उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करते हुए कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना और संबंधित कार्यवाही रद्द की। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोप और दोषसिद्धि एक ही बात नहीं हैं।

सामाजिक जीवन की बदलती तस्वीर

लेखक अपने लंबे सामाजिक अनुभव के आधार पर मानते हैं कि रोजमर्रा के सामाजिक जीवन में अनेक स्थानों पर जातिगत दूरियां पहले की तुलना में कम हुई हैं। स्कूलों, विश्वविद्यालयों, बाजारों और सार्वजनिक जीवन में नई पीढ़ी के बीच मित्रता और संवाद के आधार बदल रहे हैं।

बच्चों के बीच दोस्ती अक्सर पढ़ाई, खेल, रुचियों और आपसी व्यवहार पर आधारित होती है। बाजार में भी ग्राहक आम तौर पर दुकान या व्यवसायी की जाति पूछकर वस्तु नहीं खरीदता। चाय की दुकान, भोजनालय या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर लोगों का मेल-जोल भी अनेक मामलों में जातीय पहचान से आगे निकल चुका है।

हालांकि यह तस्वीर पूरे देश और हर सामाजिक वर्ग पर समान रूप से लागू होती है, ऐसा दावा करना भी उचित नहीं होगा। भारत के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं और भेदभाव की शिकायतों को केवल व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही सार्वभौमिक निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

राजनीतिक विमर्श में जाति की भूमिका

भारत की चुनावी राजनीति में जातीय समीकरणों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। विभिन्न राजनीतिक दल सामाजिक समूहों के समर्थन को अपने पक्ष में लाने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाते रहे हैं।

लेखक के अनुसार, जब सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तब सामाजिक समरसता प्रभावित हो सकती है। लेकिन इस बहस को किसी विशेष जाति या समुदाय को दोषी ठहराने के बजाय राजनीतिक और संस्थागत जवाबदेही के संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी होगा।

किसी भी वर्ग के खिलाफ होने वाला वास्तविक भेदभाव गंभीर समस्या है और उसका समाधान कानून के माध्यम से होना चाहिए। उसी तरह, यदि किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया जाता है, तो उसे भी कानून की उचित प्रक्रिया के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।

जांच एजेंसियों की निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण

किसी शिकायत के आधार पर पुलिस की कार्रवाई कानून के अनुरूप और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। न तो सामाजिक दबाव में किसी वास्तविक शिकायत को नजरअंदाज किया जाना चाहिए और न ही दबाव के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान किया जाना चाहिए।

न्याय व्यवस्था की भूमिका भी इसी संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण है। अदालतें आरोपों, साक्ष्यों और कानून के प्रावधानों का परीक्षण करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के मामलों से यह भी सामने आता है कि जहां आरोपों के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते या कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होती है, वहां न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं।इसलिए समस्या का समाधान कानून को कमजोर करने में नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया सुनिश्चित करने में है।

सामाजिक समरसता ही स्थायी समाधान

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जातिगत पहचान सामाजिक जीवन का एक हिस्सा रही है, लेकिन लोकतांत्रिक भारत का लक्ष्य समान नागरिकता और सामाजिक समरसता है। शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक जीवन और सामाजिक संपर्क के बढ़ते अवसरों ने कई पुराने सामाजिक विभाजनों को कमजोर किया है।

फिर भी जहां वास्तविक छुआछूत या भेदभाव मौजूद है, वहां उसके खिलाफ आवाज उठाना और कानूनी कार्रवाई करना आवश्यक है। इसी के साथ झूठे या दुर्भावनापूर्ण मामलों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है।

जातिगत भेदभाव की समस्या को नकारना भी समाधान नहीं है और हर विवाद को जातिगत संघर्ष के रूप में देखना भी उचित नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि समाज वास्तविक भेदभाव के खिलाफ दृढ़ता से खड़ा हो और कानून के दुरुपयोग की स्थिति में भी समान रूप से निष्पक्ष व्यवस्था की मांग करे।

अंततः सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज के पूरक लक्ष्य हैं। कानून कमजोर वर्गों को सुरक्षा दे, निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की भी रक्षा करे और राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर निष्पक्ष तरीके से लागू हो—यही एक स्वस्थ और न्यायपूर्ण व्यवस्था की पहचान हो सकती है।

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