राजनीति में भाषा की मर्यादा का सवाल
The question of language decorum in politics
Fri, 7 Nov 2025
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
राजनीति को जब राष्ट्रहित और सार्वजनिक सेवा की भावना से जोड़कर न देखा जाए, तब राजनीतिक शुचिता की चर्चा करना अपने आप में एक व्यर्थ विषय बन जाता है। पिछले कुछ वर्षों में सत्ता प्राप्ति के लिए जिस तरह नकारात्मक राजनीति, भीड़ जुटाने के लिए धनबल का प्रयोग और आरोप-प्रत्यारोप की नीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, उससे स्पष्ट होता है कि हमारी राजनीति अब व्यवसायिक मानसिकता की ओर तेजी से झुक चुकी है। जनता को भ्रमित करने, झूठ परोसने और फरेबी वादों के सहारे लोकतंत्र की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि ऐसा न होता तो राजनीतिक दलों से जुड़े लोग सोची-समझी रणनीति के तहत एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए भाषा का स्तर इतना नीचे न गिराते।
आज स्थिति यह हो गई है कि भारतीय सेना जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को भी राजनीतिक बहसों में जानबूझकर घसीटा जाता है। सार्वजनिक मंचों पर नेताओं की तुलना बचकाने नामों, अपमानजनक उपमाओं और हास्यास्पद शब्दों से की जाती है। जब कोई संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति इस तरह की भाषा का उपयोग करता है, तब प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है कि क्या उच्च पद पर बैठा व्यक्ति इस प्रकार के अशोभनीय और असंयमित शब्दों का प्रयोग कर सकता है?
यह केवल उदाहरण मात्र है। इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस एवं सार्वजनिक संवादों में खुले रूप से झूठ बोला जाता है और देश के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल सामान्य होता जा रहा है। कई बार तो जिस शब्द का अर्थ तक आरोप लगाने वाले व्यक्ति को ज्ञात नहीं होता, वही शब्द दलील बनकर पेश किया जाता है। और दुःखद यह कि दूसरे पक्ष के लोग भी विरोध करने के बजाय उल्टा उसी भाषा के समर्थन में कुतर्क खड़े करने लगते हैं। इसलिए केवल किसी एक दल या किसी एक व्यक्ति को दोष देना उचित नहीं है, क्योंकि इसमें लगभग सभी राजनीतिक धड़े कम-अधिक रूप में समान रूप से संलिप्त हैं।
कानूनी रूप से अमर्यादित भाषा के उपयोग पर दंड का प्रावधान अवश्य मौजूद है, पर वास्तविकता यह है कि मानहानि के मामलों में दंड का पालन अक्सर औपचारिकता तक ही सीमित रह जाता है। यही कारण है कि बिना भय के भाषाई मर्यादा तोड़ना आम बन गया है। यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो भविष्य में समाज में अराजकता फैलाने वाले तत्वों की संख्या बढ़ना स्वाभाविक होगा, जिसे रोक पाना मुश्किल हो जाएगा।
