भारत की उच्च शिक्षा का वास्तविक संकट: छात्र नामांकित हैं, लेकिन मानसिक रूप से अनुपस्थित

The real crisis in India's higher education: students are enrolled but mentally absent.
 
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लखनऊ। भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे गंभीर दौर से गुजर रही है, जहां कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन कक्षाओं में उनकी नियमित और सार्थक उपस्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। आधुनिक कैंपस, स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल सुविधाओं के विस्तार के बावजूद बड़ी संख्या में छात्र शैक्षणिक गतिविधियों से भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहे हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल उपस्थिति का संकट नहीं, बल्कि सीखने की संस्कृति और संस्थागत वातावरण से जुड़ा गहरा मुद्दा है। कई शिक्षण संस्थानों में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम, इंटरनल मार्क्स, असाइनमेंट, परीक्षा और प्लेसमेंट जैसी व्यवस्थाओं का सहारा लिया जा रहा है। हालांकि इससे छात्र शारीरिक रूप से कक्षा में तो पहुंच जाते हैं, लेकिन मानसिक रूप से उनकी सक्रिय भागीदारी सीमित रह जाती है।

उपस्थिति नहीं, जुड़ाव है असली चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश छात्र शिक्षा से नहीं, बल्कि ऐसे माहौल से दूर हो रहे हैं जहां संवाद, रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच के अवसर सीमित हैं। कई संस्थानों में कक्षाएं अब भी पारंपरिक व्याख्यान आधारित हैं, जिनका वास्तविक जीवन, उद्योग और आधुनिक तकनीक से पर्याप्त जुड़ाव नहीं है। परिणामस्वरूप छात्रों की रुचि कम होती जा रही है।एक वरिष्ठ शिक्षाविद के अनुसार, "छात्र शिक्षा से नहीं भाग रहे, बल्कि ऐसे वातावरण से दूर जा रहे हैं जहां उन्हें केवल नियंत्रित किया जाता है, समझा नहीं जाता।"

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दबाव से नहीं बढ़ती सीखने की इच्छा

कई कॉलेजों में उपस्थिति को इंटरनल मार्क्स, सेमेस्टर परीक्षा, प्रयोगशाला कार्य, प्लेसमेंट और छात्रवृत्ति से जोड़ दिया गया है। शिक्षकों का अनुभव है कि बड़ी संख्या में छात्र केवल उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कक्षा में आते हैं, जबकि उनकी वास्तविक भागीदारी और जिज्ञासा लगातार घट रही है।

मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग भी इस चुनौती को और जटिल बना रहा है। शिक्षकों के अनुसार कई बार छात्र कक्षा में मौजूद होते हैं, लेकिन उनका ध्यान पूरी तरह किसी और दिशा में केंद्रित रहता है।

बदलती पीढ़ी की बदलती सीखने की शैली

शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आज का छात्र इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, पॉडकास्ट और डिजिटल माध्यमों से लगातार सीख रहा है। वह केवल पारंपरिक व्याख्यान नहीं, बल्कि व्यावहारिक, संवादात्मक और अनुभव आधारित शिक्षा चाहता है।

यदि कक्षाओं का संबंध उद्योग, तकनीक, स्टार्टअप, अनुसंधान और वास्तविक जीवन की समस्याओं से नहीं जोड़ा जाएगा तो छात्रों की रुचि कम होना स्वाभाविक है।

शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं

विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य छात्रों में नेतृत्व क्षमता, नैतिक मूल्यों, संवाद कौशल, रचनात्मक सोच, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना है।

जब शिक्षा केवल उपस्थिति रजिस्टर, असाइनमेंट और अंकों तक सीमित हो जाती है तो व्यक्तित्व निर्माण का व्यापक उद्देश्य पीछे छूट जाता है।

भविष्य के विश्वविद्यालय कैसे हों?

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य के विश्वविद्यालय केवल भवन और नियमों तक सीमित संस्थान नहीं, बल्कि जीवंत शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र बनने चाहिए। ऐसे परिसर जहां छात्र पढ़ाई के साथ-साथ अनुसंधान, नवाचार, खेल, कला, संगीत, स्टार्टअप, पुस्तकालय, चर्चा समूह और रचनात्मक गतिविधियों में स्वाभाविक रूप से भाग लेना चाहें।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि "छात्रों को जबरन कक्षा में कैसे लाया जाए?" बल्कि यह होना चाहिए कि "ऐसा प्रेरक और छात्र-केंद्रित वातावरण कैसे बनाया जाए जहां छात्र स्वयं सीखने के लिए उत्साहित हों?"

शिक्षा व्यवस्था को चाहिए मानवीय दृष्टिकोण

लेख के अनुसार आज उच्च शिक्षा में सबसे अधिक आवश्यकता बौद्धिक और मानवीय नेतृत्व की है। केवल आकर्षक इमारतें, तकनीकी सुविधाएं और प्रशासनिक नियंत्रण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी नहीं दे सकते। संस्थानों को ऐसा वातावरण विकसित करना होगा जहां संवाद, विश्वास, नवाचार और मानवीय मूल्यों को समान महत्व मिले।

विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक समाधान कठोर नियमों और दबाव में नहीं, बल्कि छात्र-केंद्रित, प्रेरणादायक और सहभागी शिक्षण संस्कृति विकसित करने में निहित है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील, रचनात्मक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो समाज और राष्ट्र के विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें।

— डॉ. राकेश कुमार यादव
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग), डिप्टी डीन, एमएसओईटी, महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी

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