साहित्य के विद्रोही योद्धा कथाकार ज्ञानरंजन

Gyanranjan, the rebellious warrior of literature and a renowned storyteller.
 
साहित्य के विद्रोही योद्धा कथाकार ज्ञानरंजन

(संदीप सृजन – विभूति फीचर्स)  हिंदी साहित्य की दुनिया में ज्ञानरंजन ऐसा नाम है, जिसने कहानी विधा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। वे केवल एक सशक्त कथाकार ही नहीं, बल्कि ‘पहल’ जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका के संस्थापक-संपादक भी थे। उनकी रचनाएँ मानव संबंधों की जटिलताओं, सामाजिक विडंबनाओं और व्यक्ति के आंतरिक संघर्षों को इतनी गहराई से उद्घाटित करती हैं कि पाठक स्वयं को उनमें झाँकता हुआ पाता है। साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख लेखकों में ज्ञानरंजन का योगदान हिंदी साहित्य को आधुनिकता और विद्रोही चेतना से लैस करने में निर्णायक रहा।

ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुआ। उनका बचपन और किशोरावस्था अजमेर, दिल्ली और बनारस जैसे शहरों में बीती। उच्च शिक्षा उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की, जहाँ उन्हें डॉ. धीरेंद्र वर्मा और धर्मवीर भारती जैसे विद्वान शिक्षकों का सान्निध्य मिला। इलाहाबाद उनके लिए सदैव प्रिय शहर रहा, जिसने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को आकार दिया। बाद में वे जबलपुर में स्थायी रूप से बस गए, जहाँ से उन्होंने अपनी साहित्यिक गतिविधियों को दिशा दी। जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डी.लिट.) की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया।

उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि साधारण थी, किंतु साहित्य के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही गहरी थी। साठ के दशक में वे चर्चित ‘चार यार’ मंडली के सदस्य बने, जिसमें दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया जैसे रचनाकार शामिल थे। इस समूह ने हिंदी साहित्य में एक नई लहर पैदा की—जो परंपरागत ढाँचों से विद्रोह करती हुई समकालीन यथार्थ और आधुनिक संवेदनाओं को केंद्र में लाती थी।

n m,h

ज्ञानरंजन की रचनात्मक चेतना में विद्रोह एक केंद्रीय तत्व था—चाहे वह सामाजिक मानदंडों के विरुद्ध हो या अंतरंग संबंधों की जटिलता के प्रति। उन्होंने साहित्य को कभी मात्र मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे समाज की आलोचना और आत्म-निरीक्षण का औजार बनाया। उनकी जीवनशैली सादगीपूर्ण रही और लेखन में वे गुणवत्ता को सर्वोपरि मानते थे। यही कारण है कि उन्होंने मात्र 25 कहानियाँ लिखीं और उसके बाद कहानी लेखन से स्वयं को विराम दे दिया। उनका विश्वास था कि केवल श्रेष्ठ रचनाएँ ही पाठकों तक पहुँचनी चाहिए।

ज्ञानरंजन के साक्षात्कार भी उतने ही चर्चित रहे जितनी उनकी रचनाएँ। उनके स्पष्ट और कभी-कभी विवादास्पद विचार—विशेषकर नामवर सिंह जैसे साहित्यकारों पर की गई टिप्पणियाँ—हिंदी साहित्य में बहस का विषय बनीं।उनका साहित्यिक योगदान मुख्यतः कहानी विधा में है, किंतु उन्होंने संस्मरण, निबंध, संपादकीय और साक्षात्कार भी लिखे। वे साठोत्तरी कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रहे, जहाँ कहानियाँ यथार्थवाद से आगे बढ़कर व्यक्तिवाद, अलगाव और सामाजिक विडंबनाओं को स्पर्श करती हैं। उनकी रचनाओं में मानव मन की गहराइयाँ, संबंधों की जटिलता और अस्तित्व की निरर्थकता प्रमुख विषय रहे।

उनकी कहानियाँ सामान्य जीवन की असामान्य घटनाओं को केंद्र में रखती हैं—चाहे वह पिता-पुत्र संबंधों की विडंबना हो, प्रेम की विफलताएँ हों या सामाजिक बंधनों को तोड़ने का प्रयास। कहानी ‘पिता’ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ भावनात्मक सघनता पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।

ज्ञानरंजन ने साहित्य को एक संग्रहालय की भाँति देखा—जहाँ प्रत्येक कक्ष भरा-पूरा और अर्थपूर्ण होना चाहिए। उनका लेखन विद्रोही होते हुए भी अत्यंत सूक्ष्म, संयमित और संवेदनशील है। उनकी कहानियाँ रूसी, अंग्रेज़ी सहित कई भाषाओं में अनूदित हुईं। लंदन पेंग्विन की भारतीय साहित्य एंथोलॉजी में उनकी कहानी का शामिल होना उनके अंतरराष्ट्रीय महत्व का प्रमाण है। ओसाका, लंदन और सैन फ्रांसिस्को जैसे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनकी रचनाएँ पढ़ाई जाती हैं।

लेखन के साथ-साथ उनका संपादन कार्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वे ‘पहल’ पत्रिका के संस्थापक संपादक थे, जिसकी शुरुआत 1973 में हुई। आपातकाल जैसे कठिन दौर में भी ‘पहल’ ने अपनी स्वतंत्र आवाज़ बनाए रखी। उन्होंने इसके 90 अंक संपादित किए। वर्ष 2008 में पहली पारी समाप्त हुई और 2013 में अंक-91 से दूसरी पारी शुरू होकर अप्रैल 2021 (अंक-125) तक चली। अंतिम अंक को उन्होंने स्वयं अंतिम घोषित किया।

‘पहल’ ने हिंदी साहित्य को वैचारिक विस्तार दिया। इसमें प्रगतिशील, वामपंथी और आधुनिक दृष्टिकोण की रचनाएँ प्रकाशित हुईं। युवा लेखकों को मंच देने में इस पत्रिका की भूमिका ऐतिहासिक रही। इसके संपादकीय सदैव सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों से टकराते रहे और यही इसकी पहचान बनी।

ज्ञानरंजन को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य भूषण सम्मान, अनिल कुमार एवं सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार, मध्यप्रदेश शासन का शिखर सम्मान और राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान प्रमुख हैं।

7 जनवरी 2026 को उनके निधन से हिंदी साहित्य ने एक महान कथाकार और निर्भीक संपादक खो दिया। किंतु उनकी रचनाएँ, विचार और संपादन परंपरा आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी। ज्ञानरंजन सच अर्थों में साहित्य के विद्रोही योद्धा थे—जिनकी स्मृति हिंदी साहित्य में सदैव जीवित रहेगी।

Tags