बंगाल की राजनीति में भाजपा का उदय: संघर्ष, रणनीति और वैचारिक विस्तार की कहानी
(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
West Bengal की राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान Bharatiya Janata Party का उभार भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित राजनीतिक परिवर्तनों में गिना जा रहा है। कभी राज्य में सीमित जनाधार रखने वाली भाजपा आज सत्ता की मुख्य दावेदार के रूप में उभर चुकी है। यह बदलाव केवल चुनावी आंकड़ों का नहीं, बल्कि संगठन, वैचारिक विस्तार और जमीनी संघर्ष का परिणाम माना जा रहा है।
2014 से शुरू हुआ बदलाव
2014 के लोकसभा चुनावों में Narendra Modi के नेतृत्व ने बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा की। भाजपा को पहली बार राज्य में व्यापक जनसमर्थन मिलता दिखाई दिया। मोदी की रैलियों में उमड़ती भीड़ ने यह संकेत दिया कि राज्य की जनता वामपंथ और क्षेत्रीय राजनीति के बीच एक राष्ट्रीय विकल्प तलाश रही है। इसी चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत उल्लेखनीय रूप से बढ़ा और पार्टी ने राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी।
अमित शाह की संगठनात्मक रणनीति
2014 से 2019 के बीच भाजपा ने बंगाल में संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष Amit Shah ने बूथ स्तर तक संगठन विस्तार की रणनीति अपनाई। ‘विस्तारक योजना’ के जरिए गांव-गांव तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा किया गया।
इसी दौर में भाजपा ने Syama Prasad Mukherjee की विरासत को बंगाली अस्मिता से जोड़ने का प्रयास किया। इससे पार्टी को वैचारिक आधार और स्थानीय पहचान दोनों मिलीं।
हिंसा के बीच जमीनी संघर्ष
भाजपा के विस्तार के दौरान राज्य में राजनीतिक हिंसा भी बड़ा मुद्दा बनी। कई इलाकों में कार्यकर्ताओं पर हमले और झड़पों की घटनाएं सामने आईं। ऐसे माहौल में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष Dilip Ghosh ने आक्रामक शैली में संगठन को आगे बढ़ाया।
दिलीप घोष ने ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी की पहुंच बढ़ाने का काम किया और भाजपा को केवल शहरी ‘भद्रलोक’ की पार्टी की छवि से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई।
2019: भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक मोड़
2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने बंगाल में 18 सीटें जीतकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। पार्टी का वोट शेयर 40 प्रतिशत के पार पहुंचा, जिसने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
इसके बाद 2021 विधानसभा चुनाव से पहले Suvendu Adhikari का भाजपा में शामिल होना निर्णायक माना गया। नंदीग्राम सीट पर उन्होंने Mamata Banerjee को हराकर भाजपा की राजनीतिक ताकत को और मजबूत किया।
विपक्ष से सत्ता की दावेदारी तक
हालांकि 2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार नहीं बना सकी, लेकिन 3 से 77 विधायकों तक पहुंचना पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि माना गया। इसके बाद भाजपा ने विधानसभा और सड़क दोनों स्तरों पर खुद को मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया।
संदेशखाली जैसे मुद्दों, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था को लेकर भाजपा लगातार राज्य सरकार को घेरती रही। शुभेंदु अधिकारी ने विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में आक्रामक भूमिका निभाई।
बंगाल की राजनीति में नया समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा ने बंगाल की बदलती सामाजिक और राजनीतिक मानसिकता को समझते हुए अपनी रणनीति तैयार की। मोदी के विकास मॉडल, अमित शाह की संगठन क्षमता, दिलीप घोष के जमीनी संघर्ष और शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक सक्रियता ने पार्टी को राज्य में स्थायी राजनीतिक शक्ति बना दिया। आज बंगाल की राजनीति मुख्य रूप से All India Trinamool Congress और भाजपा के बीच केंद्रित दिखाई देती है। भाजपा अब केवल विपक्षी दल नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित सरकार के रूप में भी देखी जा रही है।

