तपती गर्मी और जलवायु परिवर्तन की भीषण पदचाप
Scorching heat and the terrible footsteps of climate change
Tue, 28 Apr 2026
(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)
भारत इस समय जिस प्रचंड ग्रीष्म लहर और असामान्य ताप वृद्धि के दौर से गुजर रहा है, वह अब केवल मौसमी उतार-चढ़ाव का साधारण विषय नहीं रह गया है। यह हमारे पारिस्थितिक तंत्र में बढ़ते गहरे असंतुलन की चेतावनी है, जिसे वैज्ञानिक जगत ‘जलवायु आपातकाल’ का नाम दे रहा है।

हालिया शोध और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के तुलनात्मक आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। वर्ष 2026 की यह भीषण गर्मी महज एक असामान्य मौसमी परिवर्तन नहीं, बल्कि जलवायु संकट की स्पष्ट आहट है। देश के अनेक हिस्सों में तापमान सामान्य से साढ़े चार से छह डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है। यह वृद्धि हमारे जीवन, जीविका और जल संसाधनों पर मंडरा रहे गंभीर खतरे का संकेत है।
गर्मी के तात्कालिक प्रभाव अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। स्कूलों में छुट्टियां घोषित की जा रही हैं, सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है, आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं, व्यापारिक गतिविधियां धीमी पड़ रही हैं तथा डिहाइड्रेशन और अन्य बीमारियों के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। हालांकि, इन त्वरित प्रभावों से कहीं अधिक गंभीर इसके दीर्घकालिक परिणाम हैं।
तथ्यों के आईने में देखें तो भारत में बढ़ते तापमान का एक बड़ा कारण ‘अल नीनो’ प्रभाव के साथ वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता है। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर उस खतरनाक सीमा को पार कर चुका है,
जो पिछले आठ लाख वर्षों में कभी नहीं देखा गया।
यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो पिछले 120 वर्षों में भारत के औसत तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। पहली नजर में यह आंकड़ा छोटा प्रतीत हो सकता है, किंतु पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन के लिए तापमान में एक डिग्री का दसवां हिस्सा बढ़ना भी गंभीर परिणाम ला सकता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पिछले तीन दशकों में ताप वृद्धि की रफ्तार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हुई है।
शहरी क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह होती जा रही है। वैज्ञानिक इसे ‘हीट आइलैंड इफेक्ट’ कहते हैं। शहरों में तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल और डामर की सड़कें दिनभर सूर्य की ऊष्मा को सोखती हैं और रात में उसे वातावरण में वापस छोड़ती हैं। परिणामस्वरूप रातें भी ठंडी नहीं हो पा रहीं, जिससे मानव शरीर को दिनभर की गर्मी से राहत पाने का प्राकृतिक अवसर नहीं मिल रहा। हमारा शहरी ढांचा अब गर्मी को कैद करने वाले एक ऐसे पिंजरे में बदलता जा रहा है, जहां से राहत का रास्ता मुश्किल दिखाई देता है।
इस तापीय विभीषिका का सीधा असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। शोध बताते हैं कि तापमान में प्रत्येक एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि गेहूं की पैदावार को चार से पांच प्रतिशत तक घटा सकती है। कृषि प्रधान भारत के लिए यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा पर संकट है।
इसके साथ ही बढ़ता ‘आर्द्र तापमान’ यानी गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव मानव सहनशक्ति की सीमाओं को चुनौती दे रहा है। जब वातावरण में गर्मी और आर्द्रता दोनों बढ़ जाते हैं, तब पसीना सूख नहीं पाता और शरीर स्वयं को ठंडा करने में असमर्थ हो जाता है। तटीय और मैदानी क्षेत्रों में यह स्थिति अब जानलेवा स्तर तक पहुंचने लगी है।
पर्यावरणीय दृष्टि से देखें तो हिमालयी ग्लेशियर पहले की तुलना में दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं। यह स्थिति भविष्य में गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बारहमासी नदियों के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकती है। दूसरी ओर, बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग ने ऊर्जा ग्रिडों पर अभूतपूर्व दबाव डाल दिया है। यह एक खतरनाक दुष्चक्र बन चुका है—जितनी अधिक गर्मी बढ़ेगी, उतना अधिक एयर कंडीशनर का उपयोग होगा, और उन्हें चलाने के लिए जितनी अधिक बिजली कोयले से पैदा की जाएगी, वातावरण उतना ही अधिक गर्म होता जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल आपदा आने के बाद जागने की प्रवृत्ति छोड़कर ‘जलवायु लचीलेपन’ की दिशा में ठोस कदम उठाएं। मियावाकी पद्धति से सघन शहरी वनों का विकास, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार तथा ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्यों को समय से पहले हासिल करने की दृढ़ इच्छाशक्ति ही हमें इस संकट से उबार सकती है।
विवेकपूर्ण नीति निर्धारण और जनभागीदारी के बिना इस तपती धरती को शीतल करना संभव नहीं होगा। समय आ गया है कि हम विकास की अंधी दौड़ को प्रकृति के संतुलन के तराजू पर तौलें, अन्यथा आने वाली पीढ़ियों के हिस्से केवल झुलसी हुई धरती और प्रदूषित हवा ही बचेगी। हमें समझना होगा कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही हमारे सामूहिक अस्तित्व की एकमात्र कुंजी है।
