ममत्व की छांव
(आर. सूर्य कुमारी - विनायक फीचर्स)
बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज में पढ़ा करती थी। बी.ए. फाइनल की परीक्षा चल रही थी। परीक्षा केंद्र कॉलेज से काफी दूर पड़ा था। ट्रेन से लगभग एक घंटे का सफर तय करना पड़ता था और स्टेशन से रिक्शे द्वारा पंद्रह-बीस मिनट का रास्ता और तय करना होता था। वह स्टेशन पश्चिम बंगाल का पुरूलिया स्टेशन था।

दो परीक्षाएँ तो किसी तरह ठीक से हो गईं, लेकिन एक दिन परीक्षा हॉल में अचानक मेरी तबीयत बिगड़ गई। मैंने खुद को संभालते हुए किसी तरह पूरा पेपर लिखा। परीक्षा समाप्त होने के बाद स्टेशन के पास स्थित रेलवे डिस्पेंसरी से दवा ली और एक परिचित चिकित्सा कर्मी के घर थोड़ी देर आराम किया। डॉक्टर ने बताया कि अत्यधिक थकान, नींद पूरी न होना और लगातार मेहनत के कारण शरीर कमजोर हो गया है। कई बार उल्टियाँ होने से डिहाइड्रेशन भी हो गया था।
इसी भागदौड़ में मेरी ट्रेन कब निकल गई, मुझे पता ही नहीं चला। मजबूरन बाद वाली ट्रेन पकड़नी पड़ी। ट्रेन के डिब्बे में लाइट भी नहीं थी। किसी तरह सफर कटता रहा। रात करीब आठ बजे मैं आद्रा स्टेशन पहुँची।
मन में तरह-तरह के विचार चल रहे थे। अगले पेपर की तैयारी की चिंता अलग थी। भीतर ही भीतर शिकायत भी उठ रही थी कि आजकल किसी से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भैया अपनी पढ़ाई में व्यस्त होंगे और माँ घर की जिम्मेदारियों में उलझी होंगी। कौन आएगा मुझे लेने? उस समय शाम ढलने के बाद लड़कियों का अकेले आना-जाना सहज नहीं माना जाता था। कोई रोक-टोक नहीं थी, लेकिन मन में डर जरूर रहता था।
इन्हीं अंतर्द्वंद्वों के बीच जब मैं ट्रेन से उतरकर निकासी द्वार की ओर बढ़ी, तो वहाँ माँ को मेरा इंतजार करते पाया। उन्हें देखते ही मन जैसे भीग गया। सारी शिकायतें पलभर में समाप्त हो गईं। उसी क्षण मन को एक गहरा उत्तर भी मिल गया—दुनिया से उम्मीद करें या न करें, लेकिन जब तक माता-पिता साथ होते हैं, बच्चे कभी पूरी तरह नाउम्मीद नहीं होते।
