स्वतंत्र भारत में आंदोलनों की सार्थकता: सड़कों से संसद तक लोकतंत्र की यात्रा

भाषाई राज्यों के गठन से किसान आंदोलन तक, हर दौर के संघर्ष ने बदली देश की दिशा; जनता की आवाज लोकतंत्र की ताकत

 
स्वतंत्र भारत में आंदोलनों की सार्थकता: सड़कों से संसद तक लोकतंत्र की यात्रा

अंजनी सक्सेना — विभूति फीचर्स

15 अगस्त 1947 को जब लाल किले पर पहली बार स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया गया, तब देशवासियों ने एक ऐसे भविष्य का सपना देखा था, जिसमें फैसले अपनी चुनी हुई सरकार करेगी और जनता को अपनी मांगों के लिए बार-बार सड़कों पर नहीं उतरना पड़ेगा। लेकिन आजादी के बाद के दशकों का इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में जनता की भूमिका केवल चुनाव के दिन मतदान करने तक सीमित नहीं है। जब लोगों को लगता है कि उनकी समस्याओं, अधिकारों या आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा, तब आंदोलन उनकी आवाज बनकर सामने आते हैं।

स्वतंत्र भारत की विकास यात्रा में ऐसे अनेक आंदोलन हुए, जिन्होंने सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया, सामाजिक समीकरण बदले और नई नीतियों का रास्ता खोला। भाषाई राज्यों के गठन से लेकर पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों और किसान आंदोलनों तक, इन संघर्षों ने भारतीय लोकतंत्र को अलग-अलग समय पर नई दिशा दी है।

भाषाई पहचान के लिए संघर्ष और राज्यों का पुनर्गठन

आजादी के शुरुआती वर्षों में देश के सामने भाषाई पहचान के आधार पर राज्यों के गठन का प्रश्न प्रमुखता से उठा। तेलुगु भाषी लोगों की अलग राज्य की मांग को लेकर पोट्टी श्रीरामुलु ने आमरण अनशन किया। 58 दिनों के अनशन के बाद दिसंबर 1952 में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद आंदोलन तेज हुआ और केंद्र सरकार को अलग तेलुगु भाषी राज्य के गठन की दिशा में कदम उठाना पड़ा।

1953 में आंध्र राज्य का गठन हुआ। इसके बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1956 में राज्यों की सीमाओं का व्यापक पुनर्गठन किया गया। इस घटनाक्रम ने स्पष्ट किया कि भाषाई और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी जनभावनाओं की अनदेखी करना आसान नहीं है। यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर का ऐसा आंदोलन था, जिसने देश के प्रशासनिक नक्शे को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संपूर्ण क्रांति: सत्ता ही नहीं, व्यवस्था बदलने की मांग

1974 में बिहार के छात्र आंदोलन ने देश की राजनीति को एक नया मोड़ दिया। महंगाई, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अव्यवस्था के खिलाफ शुरू हुए इस आंदोलन को जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व मिला। उन्होंने इसे ‘संपूर्ण क्रांति’ का नाम दिया। उनका विचार था कि बदलाव केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में भी सुधार होना चाहिए।

उस समय इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को इस आंदोलन से बड़ी राजनीतिक चुनौती मिली। 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किया गया। इस दौरान विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं तथा प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई। नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगी पाबंदियों ने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर देशव्यापी बहस को जन्म दिया।

1977 में आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। जेपी आंदोलन से जुड़े अनेक नेता आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में आए। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे नेताओं के राजनीतिक जीवन पर इस दौर का प्रभाव देखा गया।

इस आंदोलन ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में सत्ता की ताकत के साथ जनता की सहमति और नागरिक स्वतंत्रताओं का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

चिपको आंदोलन: पेड़ों से चिपककर बचाई प्रकृति

1970 के दशक में उत्तराखंड के चमोली क्षेत्र से उभरे चिपको आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ दिया। रेणी गांव में गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए उनसे चिपककर विरोध किया। यह संघर्ष स्थानीय जंगलों, आजीविका और पर्यावरण की रक्षा की मांग से जुड़ा था।

सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट जैसे पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन को व्यापक पहचान दिलाई। आंदोलनकारियों ने लगातार जनजागरण किया और जंगलों के संरक्षण को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया। इसके परिणामस्वरूप हिमालयी क्षेत्रों में व्यावसायिक कटाई पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाए गए।

चिपको आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी नीति या विशेषज्ञों का विषय नहीं रहने दिया। गांवों की महिलाओं और स्थानीय समुदायों ने यह दिखाया कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में आम नागरिक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इस आंदोलन ने देश में पर्यावरणीय चेतना को मजबूत करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

नर्मदा बचाओ आंदोलन: विकास के साथ पुनर्वास का सवाल

बड़े बांधों और विकास परियोजनाओं को लेकर उठे सवालों ने आगे चलकर नर्मदा बचाओ आंदोलन को जन्म दिया। मेधा पाटकर और बाबा आमटे सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बांध परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के विस्थापन, आजीविका और पुनर्वास के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

आंदोलन का केंद्रीय प्रश्न था कि विकास परियोजनाओं से बिजली, सिंचाई और अन्य सुविधाएं मिल सकती हैं, लेकिन जिन लोगों की जमीन और घर प्रभावित होते हैं, उनके अधिकारों और भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?

लंबे समय तक चले इस संघर्ष में धरना, पदयात्रा और अनशन जैसे अहिंसक तरीकों का इस्तेमाल किया गया। बांध परियोजनाओं और पुनर्वास से जुड़े मुद्दे अदालतों तक पहुंचे। इस आंदोलन ने विकास की अवधारणा पर व्यापक बहस छेड़ी और यह सवाल मजबूती से उठाया कि किसी भी परियोजना के लाभों के साथ उसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन भी आवश्यक है।

मंडल और कमंडल: सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक पहचान

1990 के दशक में भारतीय राजनीति दो बड़े विमर्शों से प्रभावित हुई। एक ओर मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का फैसला हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के इस निर्णय के समर्थन और विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुए। कुछ विरोध प्रदर्शनों के दौरान छात्रों ने आत्मदाह जैसे चरम कदम भी उठाए।

मंडल आंदोलन और उसके बाद की राजनीतिक प्रक्रिया ने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और आरक्षण को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी और अनेक क्षेत्रीय दलों का प्रभाव मजबूत हुआ। दलित राजनीति के विस्तार ने भी भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों को नई प्रमुखता दी।

इसी दौर में राम जन्मभूमि आंदोलन ने धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को राजनीति के केंद्र में स्थापित किया। लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देश की राजनीति और सामाजिक संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

अयोध्या विवाद पर नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। इसके बाद जनवरी 2024 में अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई। इन घटनाओं ने भारतीय राजनीति, धार्मिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक चलने वाली बहसों को आकार दिया।

मंडल और कमंडल के दौर ने दिखाया कि आंदोलन केवल नीतिगत बदलाव ही नहीं लाते, बल्कि समाज की प्राथमिकताओं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक विमर्श को भी बदल सकते हैं।

अन्ना आंदोलन और निर्भया कांड: भ्रष्टाचार तथा महिला सुरक्षा पर जनदबाव

नई सदी में आंदोलनों का स्वरूप भी बदलने लगा। टेलीविजन और सोशल मीडिया ने जनआक्रोश को तेजी से व्यापक समुदायों तक पहुंचाने में मदद की।

वर्ष 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। जनलोकपाल की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में बड़ी संख्या में लोग जुटे। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मध्यवर्ग, युवाओं और नागरिक संगठनों की भागीदारी ने सरकार पर जवाबदेही बढ़ाने का दबाव बनाया।

इस आंदोलन के बाद लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 अस्तित्व में आया। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी का गठन भी हुआ। हालांकि, आंदोलन की मांगों और बाद में बने कानून के बीच संबंधों को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि कानून का निर्माण एक व्यापक संसदीय प्रक्रिया का परिणाम था।

इसी अवधि में 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने देश को झकझोर दिया। महिला सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और न्याय व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इसके बाद आपराधिक कानून में संशोधन किए गए और यौन हिंसा से जुड़े अपराधों के कानूनी प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।

इन दोनों घटनाक्रमों ने दिखाया कि जब किसी मुद्दे को व्यापक जनसमर्थन मिलता है, तो वह सरकारी नीतियों और कानून निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

किसान आंदोलन: लंबे संघर्ष के बाद वापस हुए तीन कृषि कानून

कृषि क्षेत्र से जुड़े मुद्दों ने भी भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों की भूमिका को बार-बार सामने रखा है। वर्ष 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित कई क्षेत्रों के किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए। दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक चले आंदोलन में हजारों किसानों ने भाग लिया।

किसानों की प्रमुख चिंताओं में न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था, मंडियों का भविष्य और कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका शामिल थीं। केंद्र सरकार ने कानूनों को कृषि क्षेत्र में सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बताया, जबकि आंदोलनकारी संगठनों ने इनके संभावित प्रभावों पर सवाल उठाए।

सर्दी, गर्मी, बारिश और कोविड-19 महामारी की चुनौतियों के बीच आंदोलन जारी रहा। अंततः 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। संसद ने बाद में कानूनों को निरस्त कर दिया।

यह घटनाक्रम इस बात का उदाहरण बना कि लंबे समय तक चलने वाला संगठित जनआंदोलन सरकार के नीतिगत फैसले को बदलने में भूमिका निभा सकता है।

परीक्षा व्यवस्था और मतदाता सूची: नए दौर की चुनौतियां

हाल के वर्षों में छात्र अधिकारों, प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे भी जनविरोध का कारण बने हैं।

2024 में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी) को लेकर पेपर लीक के आरोप, परीक्षा परिणामों और ग्रेस मार्क्स से संबंधित विवाद सामने आए। परीक्षा में 67 अभ्यर्थियों के ऑल इंडिया रैंक-1 हासिल करने की बात ने भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया। छात्रों और अभिभावकों ने परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए।

इस विवाद के बाद जांच, कानूनी कार्यवाही और परीक्षा प्रबंधन में सुधार की मांग तेज हुई। मामले के विभिन्न पहलुओं पर जांच एजेंसियों तथा अदालतों में कार्रवाई हुई। इस पूरे घटनाक्रम ने देश की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर गंभीर विमर्श पैदा किया।

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप, जांच में सामने आए निष्कर्ष और बाद में लागू किए गए सुधार अलग-अलग तथ्य हैं। किसी भी बदलाव को सीधे आंदोलन का परिणाम मानने से पहले उसके आधिकारिक आधार और समयक्रम की पुष्टि आवश्यक है।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भी राजनीतिक और सार्वजनिक बहस देखने को मिली है। चुनाव आयोग का तर्क है कि इस प्रक्रिया के जरिए मृत, स्थानांतरित और दोहराए गए नामों की पहचान करके मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाया जा सकता है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम भी हट सकते हैं।

इस मुद्दे पर विपक्षी नेताओं ने चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा की मांग उठाई है। विरोध प्रदर्शनों, मार्च और कानूनी याचिकाओं के जरिए प्रक्रिया पर सवाल रखे गए हैं। वहीं, चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ पक्ष ने प्रक्रिया का बचाव करते हुए इसे नियमानुसार बताया है।

इस विवाद का मूल प्रश्न यह है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के साथ किसी भी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित कैसे रखा जाए। ऐसे मामलों में पारदर्शी प्रक्रिया, प्रभावी शिकायत निवारण और स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत कर सकते हैं।

आंदोलन लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का संकेत

स्वतंत्र भारत के 78 वर्षों के अनुभव बताते हैं कि आंदोलनों ने देश की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित किया है। भाषाई राज्यों के गठन ने प्रशासनिक नक्शा बदला, जेपी आंदोलन ने नागरिक स्वतंत्रताओं की अहमियत उजागर की, चिपको ने पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ा और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विकास के साथ पुनर्वास की जरूरत पर जोर दिया।

मंडल आंदोलन ने सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस को नई दिशा दी, अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जवाबदेही का प्रश्न उठाया और किसान आंदोलन ने कृषि नीतियों पर व्यापक जनसंवाद को जन्म दिया। परीक्षा व्यवस्था और मतदाता सूची से जुड़े हालिया विवाद भी इसी बड़ी लोकतांत्रिक परंपरा के हिस्से हैं, जिसमें नागरिक सरकारी फैसलों पर सवाल उठाते हैं और सुधार की मांग करते हैं।

यह भी सच है कि हर आंदोलन सफल नहीं होता। कुछ को व्यापक जनसमर्थन मिलता है, कुछ समय के साथ कमजोर पड़ जाते हैं और कुछ के परिणाम विवादों के बीच सामने आते हैं। किसी आंदोलन की सार्थकता का आकलन उसके उद्देश्य, तरीकों, जनभागीदारी और वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

लोकतंत्र केवल चुनाव और संसद तक सीमित व्यवस्था नहीं है। इसमें नागरिकों को अपनी बात कहने, शांतिपूर्ण विरोध करने और सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार भी शामिल है। साथ ही, आंदोलनों की जिम्मेदारी है कि वे तथ्यों, संवैधानिक मर्यादाओं और अहिंसक तरीकों का सम्मान करें।

आखिरकार, आंदोलनों की असली ताकत केवल भीड़ जुटाने में नहीं, बल्कि समस्याओं को सार्वजनिक विमर्श में लाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने और सकारात्मक बदलाव की संभावना पैदा करने में है। जब जनता की आवाज सुनी जाती है और असहमति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है, तभी लोकतंत्र अधिक समावेशी और मजबूत बनता है।

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