मध्यम वर्ग का मौन और सियासत का स्वर्णकाल: टैक्स, मुफ़्त योजनाएं और एक पिसती हुई आबादी
लेखक: विवेकानंद
फ्रांसीसी दार्शनिक जीन जैक्स रूसो का एक प्रसिद्ध कथन है—"अमीर सत्ता को खरीद लेते हैं और गरीब की जरूरतें उसे सत्ता के हाथों बिकने के लिए मजबूर कर देती हैं।"वर्तमान भारतीय आर्थिक परिदृश्य और राजनीतिक प्राथमिकताओं को देखें तो रूसो की यह उक्ति शत-प्रतिशत सटीक बैठती नजर आती है।
एक तरफ सरकार की लोक-कल्याणकारी मुफ़्त योजनाएं हैं और दूसरी तरफ कॉरपोरेट क्षेत्र को मिलती रियायतें। इन दोनों के बीच में पिस रहा है देश का मध्यम वर्ग (Middle Class)—वह वर्ग जो न तो सत्ता खरीदने की हैसियत रखता है और न ही अपनी लाचारी बेचने को तैयार है।

मुफ़्त रेवड़ियों का गणित: खजाने से बहती नदियां
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 तक केंद्र सरकार किसान सम्मान निधि के जरिए किसानों को 4.27 लाख करोड़ रुपये बांट चुकी है, जिसमें 22वीं किस्त के रूप में ही 18,640 करोड़ रुपये 9.32 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में हस्तांतरित किए गए।
इसके अलावा, राज्यों में 'लाडली बहना' से शुरू हुआ नकद हस्तांतरण का दौर अब पूरे देश में फैल चुका है:
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महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश: ₹1,500 प्रति माह
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कर्नाटक: ₹2,000 प्रति माह
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झारखंड और दिल्ली: ₹2,500 प्रति माह
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पश्चिम बंगाल: ₹3,000 प्रति माह
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असम व बिहार: चुनावों से ठीक पहले योजनाओं के नाम पर ₹9,000 से ₹10,000 तक की एकमुश्त सहायता।
साथ ही, 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना' के तहत देश की लगभग 80 करोड़ आबादी को मुफ़्त राशन दिया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि इन तमाम कल्याणकारी योजनाओं और चुनावी वादों का भारी-भरकम वित्तीय बोझ आखिर कौन उठा रहा है?
अर्थव्यवस्था का असली तारणहार: इनकम टैक्स भरता मिडिल क्लास
इस पूरे चक्रव्यूह का सारा बोझ देश के मध्यम वर्ग के कंधों पर है। चालू वित्त वर्ष (2026-27) में 13 जुलाई 2026 तक के आंकड़े बताते हैं कि सरकार को कॉरपोरेट टैक्स (कंपनियों के मुनाफे से) से 2.40 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला, जबकि अकेले पर्सनल इनकम टैक्स से 6.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ।
स्वयं सरकार यह स्वीकार करती है कि मध्यम वर्ग ही अर्थव्यवस्था का इंजन है। हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि अगले 10 वर्षों में भारत का मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग देश के कुल उपभोक्ता खर्च का 93% हिस्सा वहन करेगा। यानी सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि बाजार में खरीदारी और खर्च की असली ताकत इसी वर्ग के पास है।
श्रेष्ठता बोध (Superiority Complex) का नशा और गिरती जीवनशैली
मध्यम वर्ग की त्रासदी यह है कि यह जितना बेचैन है, उतना ही आत्ममुग्ध और स्वाभिमानी भी है। राजनीति इस वर्ग को समय-समय पर "देश का रीढ़" और "राष्ट्र निर्माता" होने का श्रेष्ठता बोध कराती रहती है। इसी दिखावे और आत्ममुग्धता के कारण यह वर्ग:
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₹100 से अधिक प्रति लीटर की दर से एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल खुशी-खुशी खरीद रहा है (चाहे उससे गाड़ियां खराब ही क्यों न हो रही हों)।
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पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और सड़क के लिए भारी टैक्स चुकाने के बावजूद इन बुनियादी सेवाओं के लिए निजी कंपनियों (Private Sector) को अतिरिक्त पैसे देने को मजबूर है।
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पेपर लीक, परीक्षाओं में देरी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर आवाज उठाने के बजाय खुद को दूर कर लेता है।
कर्ज के दलदल में धंसता 'मिडिल क्लास'
महंगाई, महंगी प्राइवेट शिक्षा, महंगे इलाज और घटती बचत ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। एक हालिया आकलन के अनुसार, प्रति भारतीय नागरिक पर औसतन ₹4,80,000 का कर्ज है।
चौंकाने वाला आंकड़ा: कर्जदारों की मासिक आय का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा केवल लोन की किस्त (EMI) चुकाने में चला जाता है। इसमें से 55% से अधिक कर्ज घर या संपत्ति बनाने के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा के घरेलू खर्चों और लाइफस्टाइल को बनाए रखने के लिए लिया जा रहा है।
दोहन की भी एक सीमा होती है
किसी भी देश के लिए उद्योगों की समृद्धि और गरीबों का कल्याण अत्यंत आवश्यक है। लेकिन क्या इसका पूरा मूल्य मध्यम वर्ग को निचोड़कर चुकाया जाना चाहिए?
अत्यधिक टैक्स का बोझ, घटती बचत, निजीकरण की मार और उस पर मध्यम वर्ग की रहस्यमयी चुप्पी—राजनीति के लिए भले ही यह "स्वर्णकाल" हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ा चेतावनी संकेत है। यदि इस रीढ़ की हड्डी को इसी तरह दबाया जाता रहा, तो पूरी अर्थव्यवस्था का ढांचा चरमरा सकता है।
