भविष्य भूमि में गूँजा नाद-ब्रह्म: पं. तुलसीदास और पटमेश्वरी सिंह को मिला सारस्वत सम्मान; साहित्य और संगीत की जुगलबंदी ने बाँधा समां
वरिष्ठ संगीत-साधकों का अभिनंदन
समारोह की अध्यक्षता कर रहे वयोवृद्ध साहित्यकार साहित्य भूषण डॉ. सूर्य पाल सिंह की उपस्थिति में संगीत के क्षेत्र में आधी सदी से निरंतर साधना कर रहे दो विभूतियों का सम्मान किया गया।
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हरखापुर निवासी पं. तुलसीदास द्विवेदी (गायन) और धुंधापुरवा निवासी पटमेश्वरी सिंह (ढोलक वादन) को उनकी दीर्घकालीन कला-सेवा के लिए अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
साहित्य और संगीत: एक ही आत्मा के दो रूप
कलाकारों का स्वागत करते हुए डॉ. शैलेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा:साहित्य और संगीत की जुगलबंदी ही इन दोनों विधाओं को अमरत्व प्रदान करती है। कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के नाद-ब्रह्म से ही इन दोनों की आत्मा का निर्माण हुआ है। संगीत के बिना साहित्य और साहित्य के बिना संगीत अधूरा है।"

फाग की धुनों से हुआ होली मिलन
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी अरुणेश शुक्ल ने किया। लोक-संगीत के शास्त्रीय स्वरूप को जीवंत करते हुए प्रशांत एवं आर्यन दूबे ने फाग की विविध लय-तालों की प्रस्तुति दी, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठा। इसके उपरांत उपस्थित साहित्यकारों और कलाप्रेमियों ने फूलों और गुलाल के साथ होली खेली और एक-दूसरे के सुखद भविष्य की कामना की।
साहित्य जगत की प्रमुख हस्तियाँ रही मौजूद
इस अवसर पर साहित्य भूषण शिवाकांत मिश्र ‘विद्रोही’, राजेश ओझा, घनश्याम अवस्थी सहित जनपद के अनेक गणमान्य साहित्यकार, कवि और कलाप्रेमी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन पर बल दिया।
