संस्कृति की जड़ों से जोड़ती है पथवारी पूजन की परंपरा
लोकआस्था, मंगलकामना और पारिवारिक संस्कारों का प्रतीक है पथवारी माता की पूजा
डॉ. निर्मला शर्मा — विभूति फीचर्स
भारतीय संस्कृति में जीवन का शायद ही कोई ऐसा पक्ष हो, जो लोकआस्था और परंपराओं से अछूता हो। हमारी लोकपरंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों, स्मृतियों और सामूहिक विश्वासों की धरोहर भी हैं। पथवारी पूजन ऐसी ही एक आत्मीय परंपरा है, जो हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है।
राजस्थान में नवरात्र के दौरान पथवारी पूजन का विशेष महत्व है। प्रातः स्नान के बाद कन्याएँ व्रत रखकर श्रद्धापूर्वक पथवारी माता की पूजा करती हैं। इस परंपरा में देवी के प्रति आस्था के साथ बचपन की यादें, पारिवारिक संस्कार और लोकगीतों की मिठास भी जुड़ी हुई है।
मुझे आज भी अपना बचपन याद आता है, जब हम नियमित रूप से पथवारी पूजन किया करते थे। उस समय न तो संस्कृति के व्यापक अर्थ की समझ थी और न ही यह एहसास कि हमारी छोटी-छोटी गतिविधियाँ विरासत का हिस्सा हैं। हम तो बस घर के बड़ों को देखकर उनका अनुसरण करते थे।

बालमन में अक्सर यह सवाल उठता था कि हम पथवारी माता की पूजा क्यों करते हैं। इस पर माँ सहजता से कहती थीं, “पथवारी हमारे पथ की रक्षा करती हैं।” माँ का यह छोटा-सा उत्तर मन में विश्वास भर देता था। रास्ते में डर नहीं लगता था। खेत पर जाना हो या कुएँ से पानी लेने, मन में एक सहज निर्भयता बनी रहती थी।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि लोकपरंपराएँ केवल पूजा-पद्धतियाँ नहीं होतीं। वे मन में विश्वास जगाती हैं, मानसिक संबल देती हैं और बिना किसी कठिन उपदेश के जीवन के संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुँचा देती हैं। यही हमारी लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।
लोकआस्था और मंगलकामना का प्रतीक
पथवारी पूजन का महत्व केवल बचपन की स्मृतियों तक सीमित नहीं है। आज भी जब परिवार का कोई सदस्य यात्रा पर निकलता है, तो परिजन प्रातः पथवारी माता की पूजा करते हैं और मंगलगीत गाते हैं। इन गीतों में यही कामना होती है कि माता यात्री के मार्ग की बाधाओं को दूर करें और उसकी यात्रा निर्विघ्न संपन्न हो।
इस परंपरा में देवी के प्रति श्रद्धा के साथ अपनों के प्रति चिंता, स्नेह और शुभकामना का भाव भी समाहित है। पथवारी को लोकमान्यता में मार्ग की रक्षक देवी माना जाता है। जीवन भी एक यात्रा है, जिसमें कहीं सरल रास्ते मिलते हैं तो कहीं कठिन मोड़ सामने आते हैं। ऐसे में अपने आराध्य के प्रति विश्वास व्यक्ति को धैर्य रखने और आगे बढ़ने का संबल देता है।
पथ का अर्थ है जीवन की दिशा
‘पथवारी’ शब्द का संबंध ‘पथ’ यानी रास्ते से जोड़ा जाता है। भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि में रास्ता केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा का प्रतीक भी है। हम प्रार्थना करते हैं कि हमारा मार्ग सुरक्षित रहे, बाधाएँ दूर हों और हम अपने लक्ष्य से न भटकें।
नवरात्र में कन्याओं द्वारा किया जाने वाला पथवारी पूजन देवी-शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ अपनी लोकपरंपराओं को याद करने और उनसे जुड़ने का अवसर भी है। यह परंपरा हमें बताती है कि जीवन में आगे बढ़ते हुए अपनी जड़ों और संस्कारों को नहीं भूलना चाहिए।
तालाब से गमले तक: बदलते समय में परंपरा का नया स्वरूप
मुझे आज भी वे दिन याद हैं, जब हम प्रातः तालाब पर स्नान करने जाते और वहीं पथवारी पूजन करते थे। उस समय तालाब केवल स्नान का स्थान नहीं था, बल्कि गाँव के दैनिक जीवन और सामुदायिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा भी था। तालाब की पाल, आसपास का प्राकृतिक वातावरण और पूजा के समय गूँजते मंगलगीत हमारी स्मृतियों में आज भी बसे हुए हैं।
समय बदला और गाँवों का विस्तार शहरों की ओर हुआ। शहरी जीवन में न पहले जैसे तालाब सहजता से उपलब्ध हैं और न खेतों की पगडंडियाँ। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या बदलते परिवेश के कारण हम अपनी परंपराओं को छोड़ दें?
मेरा मानना है कि परंपरा का मूल भाव जीवित रहना चाहिए, भले ही उसका स्वरूप बदल जाए। यदि आज तालाब उपलब्ध नहीं है, तो घर के आँगन या छत पर रखे गमले को धरती के प्रतीक के रूप में मानकर श्रद्धापूर्वक पूजन किया जा सकता है। स्थान छोटा हो सकता है, लेकिन आस्था और भाव वही रह सकते हैं।
एक साधारण-सा गमला भी हमें प्रकृति, संस्कृति और अपनी विरासत से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। इसके जरिए बच्चे अपनी परंपराओं के बारे में जान सकते हैं और समझ सकते हैं कि किसी भी रीति-रिवाज का महत्व केवल उसके बाहरी स्वरूप में नहीं, बल्कि उससे जुड़े भाव और विश्वास में होता है।
संस्कारों के हस्तांतरण का माध्यम
संस्कृति केवल पुस्तकों में लिखे शब्दों से जीवित नहीं रहती। वह तब जीवंत बनी रहती है, जब लोग उसे अपने व्यवहार और जीवन का हिस्सा बनाते हैं। हमने अपनी माताओं, दादियों और नानियों को पूजा करते देखा, उनके मुख से मंगलगीत सुने और उन्हीं के सान्निध्य में श्रद्धा के संस्कार सीखे।
आज हमारी बारी है कि हम अगली पीढ़ी को इन परंपराओं से परिचित कराएँ। बच्चों को केवल पूजा की विधि बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें इससे जुड़ी स्मृतियाँ, लोककथाएँ और भावनाएँ भी बतानी चाहिए। जब वे जानेंगे कि किसी परंपरा के पीछे परिवार का स्नेह, सुरक्षा की कामना और सामूहिक विश्वास जुड़ा है, तभी वे उसके महत्व को सही अर्थों में समझ पाएँगे।
पथवारी पूजन हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का अवसर देता है। आइए, इस नवरात्र में चाहे तालाब की पाल पर या घर के छोटे-से गमले के पास, श्रद्धा और मंगलकामना के साथ इस परंपरा को निभाएँ। संकल्प लें कि अपनी लोकपरंपराओं को केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उन्हें अपने जीवन और आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों में भी स्थान देंगे।
