सच्ची कहानी: अहंकार से विनम्रता तक

A True Story: From Arrogance to Humility
 
A True Story: From Arrogance to Humility
मेरी कक्षा में विवेक नाम का एक छात्र पढ़ता था। वह बहुत बुद्धिमान और होशियार था, लेकिन उसमें एक बड़ी कमी थी। वह अपने माता-पिता और बड़ों की बात नहीं मानता था। उसे लगता था कि उसे सब कुछ पता है और उसे कोई सिखा नहीं सकता।

जब भी उसकी माँ उसे पढ़ाई करने, समय पर सोने या अच्छे मित्र चुनने की सलाह देती, तो वह झुंझलाकर कहता, "मुझे सब पता है, आप मुझे मत समझाइए।" दादाजी जब जीवन के अनुभव बताते, तो विवेक उनकी बात बीच में ही काट देता। धीरे-धीरे घर में सब लोग उससे कम बात करने लगे।

एक दिन बख्शी का तालाब इंटर कॉलेज, लखनऊ के विज्ञान अध्यापक हरिश्चंद्र सिंह चौहान ने विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन किया। विवेक ने एक मॉडल बनाया। मार्गदर्शक शिक्षक ने कहा, "यदि तुम इसमें कुछ सुधार कर लो, तो यह और भी अच्छा हो जाएगा।" लेकिन विवेक ने उत्तर दिया, "मुझे किसी की सलाह की आवश्यकता नहीं है। मेरा मॉडल सबसे अच्छा है।"

प्रदर्शनी के दिन कई विद्यार्थियों ने अपने मॉडलों में शिक्षकों और अभिभावकों के सुझावों के अनुसार सुधार किए थे। विवेक का मॉडल बीच में ही खराब हो गया और उसे कोई पुरस्कार नहीं मिला। वह बहुत निराश हुआ।

प्रदर्शनी के दिन कई विद्यार्थियों ने अपने मॉडलों में शिक्षकों और अभिभावकों के सुझावों के अनुसार सुधार किए थे। विवेक का मॉडल बीच में ही खराब हो गया और उसे कोई पुरस्कार नहीं मिला। वह बहुत निराश हुआ।

 

घर आकर उसने अपनी गलती के बारे में सोचा। उसे याद आया कि माँ, पिताजी, दादाजी और शिक्षक सभी उसे समझाने का प्रयास करते थे, लेकिन वह अपने अहंकार के कारण किसी की बात नहीं सुनता था।
 

अगले दिन उसने सबसे पहले अपने माता-पिता और दादाजी से क्षमा माँगी। उसने कहा, "मैं स्वयं को सबसे अधिक समझदार समझता रहा, इसलिए आपकी बात नहीं सुनता था। अब मुझे समझ आ गया है कि अनुभव और सलाह जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।"
 

दादाजी मुस्कराए और बोले, "बेटा, जो व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, उसकी प्रगति भी रुक जाती है।"
 

उस दिन के बाद विवेक ने अपने व्यवहार में परिवर्तन किया। वह बड़ों की बात ध्यान से सुनने लगा, विनम्रता से उत्तर देने लगा और सलाह को समझकर अपनाने लगा। बहुत कम समय में ही वह विद्यालय और घर—दोनों जगह सबका प्रिय बन गया।
 

संदेश: अहंकार मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है। जो बच्चे गुरुजनों, माता-पिता और बड़ों की बात का सम्मान करते हैं, वे जीवन में अधिक सफल और सम्मानित होते हैं।

कहानीकार: हरिश्चंद्र सिंह (स०अ०), बी.के.टी., लखनऊ
 

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