लोकतंत्र के आईने में चुनाव बहिष्कार का सच

The Truth About Election Boycotts in the Mirror of Democracy
 
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पंकज श्रीवास्तव-विनायक फीचर्स)

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी राजनीतिक विवाद और चर्चाओं के बीच एक तर्क यह भी सामने आ रहा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल तब तक चुनाव न लड़ने की घोषणा करें, जब तक ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर हैं। यानी चुनाव बहिष्कार का रास्ता अपनाया जाए। इस विचार को लेकर लेखक का तर्क है कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में चुनाव बहिष्कार के अनुभवों को देखते हुए इसे प्रभावी राजनीतिक रणनीति मानना कठिन है।

सत्ता पक्ष से असहमति, विरोध और असहयोग लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन चुनावी प्रक्रिया से बाहर रहने का फैसला अलग तरह के परिणाम पैदा कर सकता है। भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे कई प्रसंग सामने रखता है, जिनके आधार पर चुनाव में भागीदारी और बहिष्कार के प्रभावों पर विचार किया जा सकता है।

1971 में मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय सहमति

1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान भारत के सामने युद्ध की स्थिति बनी। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और विपक्षी दलों के बीच वैचारिक तथा राजनीतिक मतभेद थे। लेखक के अनुसार, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय सहमति को लेकर चिंतित थीं और उन्होंने जयप्रकाश नारायण से इस संबंध में चर्चा की।

बताया जाता है कि जेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी को पटना बुलाकर पूछा कि यदि युद्ध की स्थिति बनती है तो जनसंघ का रुख क्या होगा। इस प्रसंग में वाजपेयी ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि पांडव और कौरव आपस में भले ही दो पक्ष हों, लेकिन किसी तीसरे शत्रु के सामने वे 105 होते हैं।

इसी संदर्भ में वाजपेयी ने स्पष्ट किया कि इंदिरा गांधी की सरकार से राजनीतिक और वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन देश की सुरक्षा के प्रश्न पर विपक्ष सरकार के साथ खड़ा रहेगा। दिसंबर 1971 में युद्ध शुरू हुआ और 6 दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को मान्यता दी। उस समय संसद में वाजपेयी की भूमिका और इंदिरा गांधी की प्रशंसा का प्रसंग भारतीय संसदीय इतिहास में दर्ज है।

लेखक इस प्रसंग को लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्रीय प्रश्नों के बीच संतुलन के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

बिहार आंदोलन और संपूर्ण क्रांति

1974 का बिहार आंदोलन भी भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय है। गया गोलीकांड के बाद जयप्रकाश नारायण ने बिहार सरकार के खिलाफ आंदोलन को व्यापक रूप दिया। विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर विपक्षी विधायकों के इस्तीफे हुए और 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया। उस दिन विधानसभा भंग करने की मांग के समर्थन में बड़े पैमाने पर हस्ताक्षर भी सौंपे गए।

यह आंदोलन आगे चलकर देश की राजनीति में व्यापक परिवर्तन का आधार बना और आपातकाल के विरोध की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार हुई।

1977 में चुनाव से भागने के बजाय मैदान में उतरने का फैसला

आपातकाल के दौरान विपक्ष के अनेक नेता जेल में थे और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध थे। जनवरी 1977 तक आम चुनाव की संभावना भी स्पष्ट नहीं थी। 18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की।

लेखक के अनुसार, चुनाव की घोषणा के बाद विपक्ष के कुछ नेताओं के सामने यह सवाल था कि इतने कम समय में चुनाव की तैयारी कैसे होगी। इसी संदर्भ में अटल बिहारी वाजपेयी ने जयप्रकाश नारायण से चुनाव बहिष्कार की अपील करने का आग्रह किया था।

जेपी ने इस विचार को स्वीकार नहीं किया। उनका तर्क था कि किसी भी राजनीतिक नेता को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि पूरा जनसमर्थन उसके साथ है। यदि बहिष्कार के बावजूद मतदाता मतदान करने पहुंच गए और उन्हीं मतों के आधार पर परिणाम घोषित हुआ, तो राजनीतिक रूप से बहिष्कार करने वाला पक्ष अपनी बात जनता के सामने रखने का अवसर खो देगा।

अंततः विपक्ष ने चुनाव में भाग लिया। मार्च 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष को व्यापक सफलता मिली और केंद्र में पहली बार कांग्रेस के बाहर की सरकार बनी। बिहार में जनता पार्टी ने 54 में से 52 लोकसभा सीटें जीतीं।

1983 का असम चुनाव और बहिष्कार का अनुभव

असम आंदोलन के दौर में चुनाव बहिष्कार का एक अलग उदाहरण सामने आया। फरवरी 1983 में असम विधानसभा चुनाव हुए। आंदोलन के दौरान चुनाव बहिष्कार का आह्वान और हिंसा की परिस्थितियां मौजूद थीं। चुनाव में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 72.85 लाख से अधिक थी, जबकि मतदान प्रतिशत 32.74 रहा। कांग्रेस को पड़े मतों का हिस्सा 52.53 प्रतिशत था और उसने 91 सीटें जीतीं। हेमतेश्वर सैकिया मुख्यमंत्री बने।

इस चुनाव के आंकड़े यह दिखाते हैं कि कम मतदान की स्थिति में भी संवैधानिक चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है और परिणाम घोषित हो सकते हैं। बाद में 1985 में असम समझौते के बाद विधानसभा चुनाव हुए, जिनमें असम गण परिषद सत्ता में आई।

लेखक 1983 के इस अनुभव को 1977 से तुलना करते हुए यह तर्क रखते हैं कि चुनाव का बहिष्कार किसी राजनीतिक या जनांदोलन की असहमति को स्वतः चुनावी परिणाम में परिवर्तित नहीं करता।

चुनाव आयोग व्यक्ति नहीं, संस्था है

मुख्य चुनाव आयुक्त पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची, मतदान व्यवस्था और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक दलों की आपत्तियां लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हो सकती हैं। लेकिन लेखक के अनुसार, किसी व्यक्ति को लेकर असहमति और पूरी चुनावी प्रक्रिया से अलग हो जाने के निर्णय में अंतर किया जाना चाहिए।

भारत का चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। चुनाव आयोग के बारे में संविधान के अनुच्छेद 324 में प्रावधान किया गया है। इसलिए किसी मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी पदाधिकारी को लेकर राजनीतिक मतभेद को संस्था की पूरी वैधता के प्रश्न से अलग करके देखना भी जरूरी है।

लेखक का निष्कर्ष है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर अपनी असहमति, नीतियों और विकल्प को रखने का संवैधानिक मंच भी है। उनके अनुसार, चुनावी प्रक्रिया में कमियां हों तो उनमें सुधार की मांग चुनाव मैदान में रहते हुए भी की जा सकती है।

इसीलिए लेख का केंद्रीय सवाल यही है कि असहमति को लोकतांत्रिक भागीदारी के माध्यम से व्यक्त किया जाए या चुनावी मैदान से बाहर रहकर। भारतीय राजनीतिक इतिहास के 1977 और 1983 के उदाहरणों के आधार पर लेखक चुनाव बहिष्कार के बजाय चुनावी भागीदारी को अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक माध्यम मानते हैं।

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