बारी बरसी खटन गया सी

It's my turn and I'm going to be
 
बारी बरसी खटन गया सी

(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स)    बारी बरसी खटन गया सी…

यह गीत पंजाब के उस मेहनतकश इंसान का लोकगीत है, जो बारह साल परदेस में पसीना बहाकर घर लौटता है। हर बार उसकी झोली में कुछ न कुछ होता है—कभी लोई, कभी सितारा, कभी गहना, कभी चूल्हा-ताला। ढोल बजता है, भांगड़ा होता है और सारा गांव, साले-बिरादरी नाच उठते हैं, क्योंकि मेहनत रंग लाई है—कुछ हाथ लगा है।
अब इसी गीत की रस्म को एक राजनीतिक पार्टी ने राजनीति का नया मनोरंजक कायदा बना लिया है। फर्क बस इतना है कि वहां बारह साल बाद सच में कुछ लेकर लौटा था, और यहां ये लोग रोज़ सुबह उठते हैं—खाली हाथ। खाली थाल में झूठे सबूतों की चटनी सजाते हैं, ऊपर से ढोल बजवा देते हैं—
“और अब डांस करेंगे सारे के सारे!”

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बारी बरसी खटन गया सी।

हर चुनाव, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर बजट सत्र—यही क्रम है। हाथ में कुछ ठोस नहीं, मगर उल्लास ऐसा मानो पूरी दिल्ली जीत ली हो।
राफेल डील—आई, देखी, डांस हुआ। सुप्रीम कोर्ट बैठा, सीबीआई बैठी, ईडी बैठी—सबने कहा, कुछ नहीं। मगर इनकी थिरकन अभी थमी नहीं। अब राफेल आसमान में उड़ते हैं और ये ज़मीन पर वही स्टेप्स दोहराते हैं। असल ज़िंदगी में री-प्ले नहीं मिलता, पर यहां हर साल रीमिक्स है।
“चौकीदार चोर है”—क्या पंचलाइन थी! इतनी जोरदार कि पार्टी कार्यकर्ता झूम उठे। मगर सबूत? वो तो बाद में देखेंगे, पहले डांस। अब सात साल हो गए। अदालत ने कहा—सबूत नहीं मिला। जांच एजेंसियों ने कहा—सबूत नहीं मिला। मगर ये कहते हैं, “हमें तो अब भी यकीन है।”
यकीन है—पर किस बात पर, ये पूछना मना है।
ईवीएम और वोट चोरी—चुनाव हारो, तुरंत मशीन पर ठुमका लगाओ। कभी बैटरी बदली, कभी हैकिंग, कभी हनुमान चालीसा। मगर जब पूछो कि पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल में तुम जीते कैसे? तब मशीन ठीक थी या वहां भी भगवान का चमत्कार था? सवाल सुनते ही डांस और तेज़—क्योंकि यह सवालों के जवाब का नहीं, जश्न का मौका है।
संविधान की प्रति हाथ में, लाल किताब बगल में, आंखों में नमी, होंठों पर गांधी, मन में नेहरू और जेब में… खैर।
“संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ”—तीनों थाली में सजे, वही ठुमके। संविधान पढ़ने का वक्त कहां? जब तक अनुच्छेद खोलोगे, तब तक कोई और डांस शुरू हो जाएगा।
नरवडे जी की अप्रकाशित पुस्तक—यह तो कमाल है।
अप्रकाशित। यानी छपी नहीं। किसी ने पढ़ी नहीं। उसमें है क्या—किसी को पता नहीं। मगर प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी, आरोप लग चुके, डांस शुरू हो चुका। फर्जी कॉपी हवा में लहराकर ठुमके लग चुके। साहित्य में किताब छपने पर चर्चा होती है, यहां किताब छपने से पहले ही आरोप, नाच और शोर—सब साथ।
अमेरिका से डील—ताज़ा एंट्री।
डील में हुआ क्या, किसने की, कैसे की, कितने में की—बारीक अध्ययन, विवेचन, जानकारी—सब शून्य। मगर आरोप हवा में हैं और आरोपों के सहारे हवा-हवाई डांस चालू है। इतनी ऊर्जा है कि पावर परचेज एग्रीमेंट कर लेना चाहिए।
अब सवाल यह नहीं कि इन मुद्दों में दम है या नहीं।
सवाल यह है कि जब हर बार थाल खाली निकलती है, तो फिर भी ढोल क्यों बजता है?
“भेड़िया आया, भेड़िया आया”—आख़िर कब तक?
लकड़ी की हांडी कितनी बार चढ़ेगी?
क्योंकि अब आरोप कोई बहस नहीं, रस्म बन गए हैं। और रस्में सबूतों की मोहताज नहीं होतीं।
राफेल झूठा, चौकीदार सच्चा—फिर भी नारा वही।
ईवीएम सही, वोट सुरक्षित—फिर भी चीख वही।
किताब अप्रकाशित, आरोप प्रकाशित—फिर भी थिरकन वही।
“बारी बरसी खटन गया सी।”
हर बार खाली हाथ—पर हर बार पूरा उल्लास।

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