बिहार में दीपावली पर काली पूजा की अनूठी परंपरा: आस्था, शक्ति-साधना और सांस्कृतिक विरासत का संगम
(कुमार कृष्णन – विभूति फीचर्स) दीपावली का पर्व देशभर में मां लक्ष्मी की आराधना, दीपों की रोशनी और खुशियों के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लेकिन बिहार के कई क्षेत्रों में कार्तिक अमावस्या की रात मां काली की विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। इस अवसर पर मंदिरों से लेकर भव्य पूजा पंडालों तक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। कहीं पारंपरिक विधि-विधान से शक्ति की उपासना होती है, तो कहीं आकर्षक प्रतिमाओं, भव्य सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से उत्सव की छटा बिखरती है।
बिहार में काली पूजा महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकआस्था, ऐतिहासिक परंपरा और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। इस पर्व के साथ मेले, भजन-कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रतिमा विसर्जन जैसी परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं, जो इसे स्थानीय जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती हैं।
शक्ति की प्रतीक हैं मां काली
बिहार की धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कृति में मां काली का विशेष स्थान है। शाक्त परंपरा में उन्हें आदिशक्ति और सृष्टि की मूल ऊर्जा माना गया है। उनका उग्र स्वरूप बुराई, अहंकार, अन्याय और अत्याचार के विनाश का प्रतीक है। हाथों में तलवार, गले में मुंडमाला और बाहर निकली जीभ जैसे प्रतीकों के पीछे गहरे आध्यात्मिक अर्थ छिपे हैं।
भक्तों के लिए मां काली केवल शक्ति की देवी नहीं, बल्कि संकटों से रक्षा करने वाली और भय से मुक्ति दिलाने वाली माता भी हैं। यही वजह है कि बिहार के गांवों से लेकर बड़े शहरों तक उनकी आराधना के प्रति लोगों में गहरी श्रद्धा दिखाई देती है।
भागलपुर में तीन सौ साल पुरानी काली पूजा की परंपरा
बिहार में काली पूजा की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख हो और भागलपुर का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। यहां काली पूजा का इतिहास लगभग तीन सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। यह आयोजन अब शहर की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
भागलपुर के विभिन्न मोहल्लों में स्थापित काली प्रतिमाओं की अपनी अलग पहचान और मान्यता है। वहवलपुर काली, बुढ़िया काली, बमकाली, हड़बड़िया काली, मसानी काली, जुल्मी काली और नवयुगी काली जैसे नाम स्थानीय आस्था और ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़े हुए हैं।
दीपावली के अवसर पर पूरा शहर रोशनी और भक्ति के रंग में रंग जाता है। पूजा पंडालों की सजावट, प्रसाद वितरण और प्रतिमाओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। आसपास के गांवों और दूसरे जिलों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। विसर्जन के दौरान विभिन्न पूजा समितियों की भागीदारी इस आयोजन को सामूहिक उत्सव का स्वरूप प्रदान करती है।
दरभंगा का श्यामा माई मंदिर है आस्था का प्रमुख केंद्र
मिथिला की धार्मिक परंपरा में दरभंगा स्थित श्यामा माई मंदिर का विशेष महत्व है। दरभंगा राज परिसर में स्थित इस मंदिर का निर्माण महाराजा रामेश्वर सिंह ने कराया था। मंदिर श्मशान भूमि से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण भी विशिष्ट पहचान रखता है।
शाक्त साधना में श्मशान का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। मां काली के इस स्वरूप में जीवन-मृत्यु, सृजन-संहार और भय-निर्भयता जैसे गहरे दार्शनिक भाव समाहित हैं।
श्यामा माई मंदिर में वर्षभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन दीपावली पर काली पूजा और नवरात्रि के दौरान यहां विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है। मिथिला के जनजीवन में यह मंदिर गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।
कजरा में 1884 से जुड़ी है काली पूजा की परंपरा
लखीसराय जिले के कजरा क्षेत्र में भी काली पूजा का ऐतिहासिक महत्व है। यहां वर्ष 1884 के आसपास इस पूजा की शुरुआत होने का उल्लेख मिलता है। समय के साथ यह आयोजन व्यापक होता गया और इसके साथ मेले की परंपरा भी जुड़ गई।
यह मेला आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर बनता है। मेले में खानपान, स्थानीय व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियां भी आकर्षण का केंद्र रहती हैं। छोटे दुकानदारों, कारीगरों और स्थानीय कारोबारियों को इससे रोजगार के अवसर मिलते हैं।
किशनगंज की बूढ़ी काली मंदिर की अलग पहचान
सीमांचल के किशनगंज जिले में स्थित बूढ़ी काली मंदिर भी अपनी धार्मिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां वर्ष 1902 से काली पूजा होने की बात कही जाती है।
इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विशेषता यह है कि यहां बिहार और बंगाल की परंपराओं का सुंदर मेल दिखाई देता है। भाषा, खानपान, लोकाचार और धार्मिक मान्यताओं में दोनों क्षेत्रों के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा है। काली पूजा की लोकप्रियता को भी इसी ऐतिहासिक और सामाजिक संपर्क के संदर्भ में समझा जा सकता है।
जमुई के लछुआड़ में तांत्रिक साधना की परंपरा
जमुई जिले के लछुआड़ क्षेत्र में स्थित काली मंदिर से जुड़ी तांत्रिक पूजा की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि यहां दीपावली की मध्यरात्रि में विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में मां काली की पूजा वैदिक और तांत्रिक, दोनों परंपराओं के अनुसार होती है। सामान्य श्रद्धालु जहां फूल, माला, दीप और प्रसाद अर्पित कर देवी की आराधना करते हैं, वहीं कुछ स्थानों पर विशेष धार्मिक विधान के तहत अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। इन सभी परंपराओं का मूल भाव शक्ति की उपासना और देवी के प्रति अटूट श्रद्धा है।
बंगाल से सांस्कृतिक जुड़ाव ने दी काली पूजा को नई पहचान
बिहार में काली पूजा की परंपरा को बंगाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भागलपुर, पूर्णिया, किशनगंज और सीमांचल के अन्य क्षेत्रों का बंगाल के साथ लंबे समय से व्यापारिक और सामाजिक संबंध रहा है।
रेलवे के विस्तार, रोजगार और प्रशासनिक गतिविधियों के कारण दोनों क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ा। बंगाल से आए परिवारों ने अपनी धार्मिक परंपराओं को बिहार में भी आगे बढ़ाया। स्थानीय समाज ने भी इन परंपराओं को अपने लोकजीवन के अनुरूप अपनाया। इसी सांस्कृतिक समन्वय ने बिहार में काली पूजा को विशिष्ट पहचान प्रदान की।
बंगाल में दीपावली की अमावस्या को काली पूजा का विशेष महत्व है। कोलकाता का कालीघाट शक्तिपीठ और दक्षिणेश्वर काली मंदिर इस परंपरा के प्रमुख धार्मिक केंद्र हैं। बिहार के कई इलाकों में भी इसी तिथि को मां काली की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। हालांकि स्थानीय परंपराओं के अनुसार पूजा पद्धति, प्रतिमाओं की बनावट और उत्सव के स्वरूप में विविधता देखने को मिलती है।
गुड़हल और कमल के फूलों का धार्मिक महत्व
मां काली की पूजा में फूलों का विशेष महत्व है। लाल गुड़हल देवी को अर्पित किए जाने वाले प्रमुख फूलों में शामिल है। लाल रंग को शक्ति, ऊर्जा और देवी के उग्र स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा कमल सहित अन्य फूल भी श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाते हैं।
