उत्तरवाहिनी गंगा का जल, वैद्यनाथ की कृपा और लोक आस्था का महासंगम देवघर का श्रावणी मेला
शिव शंकर सिंह पारिजात — विभूति फीचर्स
श्रावण का महीना भगवान शिव की आराधना और भक्ति का पर्व है। सावन की फुहारों के साथ जब प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़ती है, तब बिहार और झारखंड का एक बड़ा हिस्सा ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंजने लगता है। देश के विभिन्न राज्यों के साथ पड़ोसी नेपाल से भी हजारों श्रद्धालु सुल्तानगंज पहुंचते हैं। यहां उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर कांवरिया नंगे पांव लगभग 110 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं और ज्योतिर्लिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं।
सुल्तानगंज से देवघर तक की यह यात्रा महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक आस्था, अनुशासन, सेवा, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्भुत संगम है। पूरे श्रावण मास में लगभग 110 किलोमीटर लंबा कांवरिया मार्ग एक विराट मेले का रूप ले लेता है। पिछले वर्ष इस आयोजन में करीब 50 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का उल्लेख मिलता है, जबकि इस वर्ष लगभग 60 लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है।
वैद्यनाथ धाम और रावण से जुड़ी मान्यता
देवघर का बाबा वैद्यनाथ धाम भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रतिष्ठित माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार लंकापति रावण ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी और इसी कारण इसे रावणेश्वर वैद्यनाथ भी कहा जाता है।
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि बाबा वैद्यनाथ को बेलपत्र, पुष्प और पवित्र गंगाजल अर्पित करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही लोकविश्वास सदियों से इस यात्रा को जनजीवन और धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा बनाए हुए है।
भगवान शिव को जल अर्पित करने की परंपरा प्राचीन है। सुल्तानगंज में गंगा उत्तरवाहिनी होती हैं, इसलिए धार्मिक दृष्टि से इस स्थान का विशेष महत्व माना जाता है। इसी कारण यहां से गंगाजल लेकर देवघर में बाबा वैद्यनाथ को अर्पित करने की परंपरा को विशेष पवित्रता प्राप्त हुई है।
एक लोकमान्यता यह भी है कि भगवान श्रीराम ने सबसे पहले सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर वैद्यनाथ धाम में अर्पित किया था। इस मान्यता के ऐतिहासिक प्रमाण अलग विषय हैं, लेकिन लोकविश्वास के रूप में इसका प्रभाव आज भी कांवर यात्रा की परंपरा में दिखाई देता है।
गंगा स्नान से शुरू होती है यात्रा
सावन शुरू होते ही सुल्तानगंज में देश के विभिन्न हिस्सों से शिवभक्तों का आगमन शुरू हो जाता है। कांवरिया सबसे पहले उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान करते हैं। इसके बाद कांवर सजाकर पूजा-अर्चना की जाती है और अजगैबीनाथ महादेव के दर्शन के बाद देवघर की पैदल यात्रा शुरू होती है।
कंधे पर कांवर, पैरों में लंबी यात्रा की थकान और होंठों पर लगातार गूंजता ‘बोल बम’—यही इस यात्रा की विशिष्ट पहचान है।
कांवरिया मार्ग बिहार के भागलपुर, मुंगेर और बांका जिलों से गुजरते हुए झारखंड के देवघर और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचता है। रास्ते में असरगंज, कुमरसार, जिलेबिया, अबरखा, इनारावरण और गोड़ियारी जैसे प्रमुख पड़ाव आते हैं। आगे की यात्रा में कांवरिया झारखंड की सीमा में प्रवेश करते हैं और फिर देवघर की ओर बढ़ते हैं। बाबा वैद्यनाथ को गंगाजल अर्पित करने के साथ उनकी यात्रा पूर्ण होती है।
डाक बम की कठिन साधना
सामान्य कांवरिया यह दूरी तीन से चार दिनों में पूरी करते हैं। रास्ते में निर्धारित स्थानों पर विश्राम करते हुए वे आगे बढ़ते हैं। लेकिन कुछ श्रद्धालु बिना रुके दौड़ते हुए लगभग 24 घंटे में यह यात्रा पूरी करने का संकल्प लेते हैं। इन्हें ‘डाक बम’ कहा जाता है। डाक बम के लिए यह यात्रा केवल शारीरिक क्षमता की परीक्षा नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और दृढ़ संकल्प की भी कठिन कसौटी होती है।
सेवा और सामाजिक सहभागिता की मिसाल
श्रावणी मेले की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक इसकी व्यापक सामाजिक भागीदारी है। यहां श्रद्धा किसी एक वर्ग, जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए श्रद्धालु एक ही धार्मिक अनुशासन और आस्था के सूत्र में बंध जाते हैं।
कांवरिया मार्ग पर जगह-जगह स्थानीय लोग और स्वयंसेवी संस्थाएं सेवा शिविर लगाते हैं। कहीं पानी पिलाया जाता है, कहीं भोजन कराया जाता है, तो कहीं चिकित्सा और विश्राम की व्यवस्था की जाती है। थके हुए यात्रियों की सहायता और उनके लिए सुविधाएं जुटाना लोक सहभागिता और सामाजिक संवेदनशीलता का सुंदर उदाहरण है।
प्रकृति के बीच आस्था की यात्रा
श्रावणी यात्रा का एक खूबसूरत पक्ष इसका प्रकृति से जुड़ाव भी है। सुल्तानगंज की गंगा से शुरू होकर देवघर तक की यात्रा में कांवरियों को खेत, बाग-बगीचे, नदी-नाले, पहाड़ी क्षेत्र और हरियाली से गुजरना पड़ता है। सावन की फुहारें लंबी और कठिन यात्रा को भी एक अलग आध्यात्मिक सौंदर्य प्रदान करती हैं।
शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर यह यात्रा शरीर को थकाती जरूर है, लेकिन अनेक श्रद्धालुओं के लिए मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का माध्यम भी बनती है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मिलता है सहारा
लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। कांवरिया मार्ग से जुड़े छोटे कस्बों और गांवों के दुकानदार, परिवहनकर्मी, भोजनालय संचालक, छोटे व्यापारी, अस्थायी दुकानें और सेवा संस्थाएं सीधे या परोक्ष रूप से इस मेले से जुड़ते हैं।
इस प्रकार श्रावणी मेला धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ एक बड़ा लोक-आर्थिक तंत्र भी बन जाता है, जो हजारों परिवारों की आजीविका को सहारा देता है।
आस्था के साथ पर्यावरण की चिंता
इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन के कारण पर्यावरण और प्रशासन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। प्लास्टिक कचरा, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव, स्वच्छता, यातायात प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
इन चुनौतियों का समाधान केवल मेले की अवधि तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक योजना के तहत किया जाना चाहिए। लोक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाना समय की जरूरत है।
लोकजीवन की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा
दरअसल श्रावणी मेला भारतीय लोकजीवन की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जिसमें धर्म मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। वह सड़कों पर उतरता है, लोकगीतों में गूंजता है, सेवा और सहयोग में दिखाई देता है और लाखों लोगों को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ता है।
देवघर का श्रावणी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बिहार और झारखंड की साझा सांस्कृतिक पहचान, लोक आस्था और सामाजिक सहभागिता का विराट उत्सव है। कांवरिया के कदम भले ही देवघर की ओर बढ़ते हों, लेकिन यह यात्रा भारतीय समाज की उस सामूहिक चेतना की ओर भी जाती है, जहां आस्था मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है।

