सोशल मीडिया का शोर और बड़बोलेपन का जाल: तमाशा बनती संवेदनाएं
सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
आदमी या तो अपने बड़बोलेपन में मारा जाता है या फिर किसी ऐसे मोहजाल में फंसकर, जहां सामने वाला उसकी कमजोरियों को हथियार बना लेता है। नशीली बातों और आकर्षक व्यक्तित्व के प्रभाव में बह जाने वाले को कब अपनी ही कही बातों का खामियाजा भुगतना पड़ जाए, यह पहले से तय नहीं होता। इतिहास और वर्तमान, दोनों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां शब्दों की एक चूक ने अच्छे-खासे व्यक्ति को मुश्किल में डाल दिया।
आज का दौर प्रचार का है। कानून अपनी जगह है और सोशल मीडिया का शोर अपनी जगह। नाबालिग होने के अपने फायदे बताए जाते हैं और बालिग होने के अपने नुकसान। किसी गंभीर प्रकरण में आरोपी को कानून के प्रावधानों के चलते राहत मिल जाती है तो कहीं विवादास्पद आचरण भी चर्चा और प्रचार का कारण बन जाता है। कभी किसी के निधन से पहले ही उसकी तेरहवीं का ऐलान कर समोसे की दावत कर दी जाती है और उसमें शामिल होने वालों की भी कमी नहीं रहती। सवाल यह भी उठता है कि ऐसी दावतों के लिए संसाधन कहां से आए, लेकिन चर्चा का केंद्र अक्सर मूल सवाल नहीं, बल्कि तमाशा बन जाता है।
आज सम्मान और प्रसिद्धि की परिभाषाएं भी तेजी से बदल रही हैं। जो बात कल अभद्र मानी जाती थी, वह आज सोशल मीडिया पर वायरल होने का माध्यम बन सकती है। किसी की आस्था का मजाक उड़ाइए, सार्वजनिक मंच पर अपशब्द कहिए या अश्लील भाषा और भाव-भंगिमाओं से विवाद खड़ा कीजिए—यदि उससे प्रचार मिल रहा है तो कुछ लोगों के लिए यही सफलता का पैमाना बन जाता है।
रहीम ने कहा है—“रहिमन इस संसार में, भांति-भांति के लोग।”
जब बकवास और अभद्रता को भी प्रसिद्धि मिलने लगे तो फिर शालीन भाषा बोलने की जरूरत किसे महसूस होगी? प्रचार चाहे सम्मान से मिले या विवाद से, आखिर प्रचार तो प्रचार है।सस्ता प्रचार पाने की होड़ में कुछ लोग अपने बड़बोलेपन में इतने आगे निकल जाते हैं कि उन्हें यह भी एहसास नहीं रहता कि वे किसके उकसावे में क्या बोल रहे हैं। किसी के मीठे शब्द, लगातार मिल रहा ध्यान और सामने वाले की महत्वाकांक्षाओं को सहलाती बातचीत कई बार व्यक्ति को ऐसी बातें कहने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिनका बाद में उसे खामियाजा भुगतना पड़ता है।

यहीं से शुरू होता है मोहजाल का वह चक्रव्यूह, जिसे लेखकीय रूपक में ‘विष कन्याओं का चक्रव्यूह’ कहा जा सकता है। उद्देश्य किसी स्त्री को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करना है जिसमें किसी व्यक्ति को भावनात्मक रूप से प्रभावित करके उसके मुंह से ऐसी बातें कहलवाई जाती हैं या उससे ऐसे काम करवाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल बाद में उसके खिलाफ किया जा सके।
आदिकाल से ही मनुष्य के पतन में उसका अपना अहंकार और बड़बोलापन बड़ी भूमिका निभाता आया है। सामने वाला केवल अवसर देता है, लेकिन अंतिम शब्द तो व्यक्ति स्वयं बोलता है। इसलिए अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना किसी भी सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी सावधानियों में से एक है।
पॉडकास्ट और सोशल मीडिया का नया चक्रव्यूह
आज दिल्ली के जंतर-मंतर जैसे सार्वजनिक स्थलों से लेकर सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों तक, ऐसे अनेक अवसर दिखाई देते हैं जहां किसी व्यक्ति से बातचीत के नाम पर विवादित बयान निकलवाने की कोशिश की जाती है। पॉडकास्ट, इंटरव्यू और वायरल वीडियो की दुनिया में कई बार सवाल पूछने का तरीका ही ऐसा होता है कि सामने वाला उत्तेजित होकर कुछ ऐसा बोल देता है, जिसे बाद में काट-छांटकर या संदर्भ से अलग करके प्रसारित किया जा सकता है।
यहां अभिमन्यु का चक्रव्यूह याद आता है। महाभारत की कथा में अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश का ज्ञान रखता था, लेकिन उससे बाहर निकलने की पूरी विधि नहीं जानता था।आज का डिजिटल चक्रव्यूह भी कुछ ऐसा ही है। इसमें प्रवेश करना आसान है, लेकिन एक बार विवाद के केंद्र में आने के बाद उससे बाहर निकलना उतना आसान नहीं रहता। एक बयान रिकॉर्ड होता है, फिर उसका छोटा-सा हिस्सा वायरल होता है, उसके बाद प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू होता है और देखते ही देखते व्यक्ति स्वयं अपने शब्दों का कैदी बन जाता है।
बड़बोलेपन से बचना ही सबसे बड़ी सुरक्षा
लोकप्रियता के पीछे भागने वालों को यह समझना होगा कि हर कैमरा मित्र नहीं होता और हर सवाल मासूम नहीं होता। किसी सार्वजनिक मंच पर कही गई बात रिकॉर्ड होकर हमेशा के लिए इंटरनेट पर रह सकती है।इसलिए बोलने से पहले सोचना जरूरी है—क्या यह बात तथ्यात्मक है? क्या इसे संदर्भ से अलग करके पेश किया जा सकता है? क्या इसके कानूनी या सामाजिक परिणाम हो सकते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या मैं यही बात कैमरे के सामने नहीं बल्कि अपने परिवार और समाज के सामने भी दोहरा सकता हूं?
चक्रव्यूह किसी भी रूप में हो सकता है। कभी वह राजनीतिक हो सकता है, कभी सामाजिक, कभी डिजिटल और कभी भावनात्मक। उससे बचने का सबसे कारगर उपाय है—विवेक, संयम और अपनी भाषा पर नियंत्रण।सस्ती लोकप्रियता कुछ क्षणों के लिए तालियां जरूर दिला सकती है, लेकिन वही लोकप्रियता बाद में परेशानी का कारण भी बन सकती है। इसलिए किसी के उकसावे में आकर बोलने से बेहतर है कि व्यक्ति कुछ क्षण चुप रहे।आखिरकार, हर चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए युद्ध-कौशल से अधिक जरूरी है यह समझना कि चक्रव्यूह रचा किसने, क्यों रचा और उसमें प्रवेश करने की जरूरत आखिर पड़ी ही क्यों।
