विश्वयुद्ध की दहलीज पर दुनिया, भारत के लिए अग्निपरीक्षा का समय
(ओंकारेश्वर पांडेय – विनायक फीचर्स)
इतिहास गवाह है कि जब कूटनीति की आवाज धीमी पड़ने लगे और हथियारों की गड़गड़ाहट तेज हो जाए, तब युद्ध की आहट दूर नहीं होती। 27 फरवरी 2026 का दिन वैश्विक तनाव की उस कगार को दर्शाता है, जहाँ से हालात तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य जमावड़े, कड़े अल्टीमेटम और विफल वार्ताओं ने विश्व राजनीति को अस्थिर कर दिया है।
होर्मुज: ऊर्जा की लाइफलाइन पर साया
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्रीय मार्ग है, जहाँ से वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% गुजरता है। यदि यहां सैन्य टकराव होता है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल और वैश्विक आर्थिक संकट लगभग तय माना जा रहा है।
अमेरिकी तैनाती: शक्ति प्रदर्शन या युद्ध की तैयारी?
अमेरिका ने क्षेत्र में अपने दो अत्याधुनिक विमानवाहक पोत—
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यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड
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यूएसएस अब्राहम लिंकन
—तैनात किए हैं। इनकी उपस्थिति केवल सामरिक दबाव नहीं, बल्कि संभावित कार्रवाई का संकेत भी मानी जा रही है।
इसी बीच रूस, चीन और ईरान के बीच ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी बेल्ट-2026’ अभ्यास ने पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ा दी है। यह अभ्यास उस उभरते बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन का प्रतीक है, जो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है।
परमाणु वार्ता: गतिरोध की स्थिति
जिनेवा में हालिया वार्ताएँ बेनतीजा रहीं। अमेरिका ईरान से उसकी प्रमुख परमाणु सुविधाएँ—फोर्डो, नतांज और अराक—समाप्त करने की मांग कर रहा है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता का प्रश्न बता रहा है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ा अल्टीमेटम दिया है, जिससे तनाव और बढ़ गया है।
ईरान की जवाबी क्षमता
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के पास तेज रफ्तार हमला नौकाओं और लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइलों का बड़ा बेड़ा है। यदि टकराव होता है, तो यह संघर्ष केवल अमेरिका-ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लेबनान, यमन और इराक जैसे क्षेत्रों में सक्रिय समूह भी शामिल हो सकते हैं। इस स्थिति में पूरा पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस सकता है।
भारत की अग्निपरीक्षा
भारत के लिए यह संकट बहुआयामी है—
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भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, जिसमें ईरान पूर्ण सदस्य है।
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वहीं, क्वाड के तहत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी है।
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चाबहार पोर्ट भारत की मध्य एशिया तक पहुँच का महत्वपूर्ण मार्ग है।
यदि तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और चालू खाता घाटे पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
भारत को संतुलित कूटनीति, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और सामरिक धैर्य का परिचय देना होगा। यह केवल विदेश नीति की परीक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और वैश्विक नेतृत्व क्षमता की भी कसौटी है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
1914 और 1939 में भी विश्व ने ऐसे ही तनाव देखे थे, जहाँ छोटी चिंगारी ने वैश्विक युद्ध का रूप ले लिया। आज प्रश्न यही है—क्या कूटनीति अंतिम क्षण में जीत पाएगी, या दुनिया फिर एक महायुद्ध की ओर बढ़ेगी? फारस की खाड़ी की लहरें फिलहाल शांत हैं, पर भीतर उबाल है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि मानवता संवाद का रास्ता चुनती है या संघर्ष का।
लेखक परिचय
ओंकारेश्वर पांडेय वरिष्ठ पत्रकार, अंतरराष्ट्रीय मामलों के रणनीतिक विश्लेषक और चुनाव रणनीतिकार हैं। वे ‘गोल्डन सिग्नेचर’ के संस्थापक एवं सीईओ हैं और यूनेस्को MIL एलायंस, विश्व आर्थिक मंच, FAO तथा विभिन्न वैश्विक मंचों से जुड़े रहे हैं।

