बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया और भगवान महावीर की प्रासंगिकता: क्या 'अहिंसा' ही है विश्व युद्ध का एकमात्र समाधान?
लेखक: अतिवीर जैन 'पराग' (पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय) संपादन: वेब डेस्क | 29 मार्च 2026
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद अब इज़रायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव आधुनिक सभ्यता को तीसरे विश्व युद्ध और परमाणु विनाश की दहलीज पर ले आया है। विनाश के इस मुहाने पर खड़े संसार के लिए भगवान महावीर के ढाई हजार साल पुराने उपदेश—'जियो और जीने दो'—आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और अनिवार्य हो गए हैं।
महावीर: केवल जैनों के नहीं, संपूर्ण मानवता के पथप्रदर्शक
अक्सर अज्ञानवश भगवान महावीर को जैन धर्म का प्रवर्तक मान लिया जाता है, जबकि वह 24वें तीर्थंकर थे। जैन धर्म का प्रारंभ प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) से हुआ था।
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जीवन परिचय: ईसा से 599 वर्ष पूर्व बिहार के कुंडलपुर में जन्में वर्धमान ने 30 वर्ष की आयु में राजपाट त्याग दिया। 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद उन्होंने 'कैवल्य ज्ञान' प्राप्त किया और समाज को अंधविश्वास व कर्मकांडों से मुक्त कराकर सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य का मार्ग दिखाया।
अहिंसा की सूक्ष्म व्याख्या: द्रव्य और भाव हिंसा
भगवान महावीर ने अहिंसा को केवल शारीरिक चोट न पहुँचाने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसके दो मुख्य रूप बताए:
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द्रव्य हिंसा: किसी प्राणी को अस्त्र-शस्त्र या शारीरिक रूप से हानि पहुँचाना।
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भाव हिंसा: मन में किसी के प्रति क्रोध, कपट, घृणा या चोरी का विचार लाना। महावीर के अनुसार, केवल मनुष्यों में ही नहीं, बल्कि वनस्पति, जल और पत्थरों में भी जीवन है। इसलिए प्रकृति के प्रति करुणा रखना भी अहिंसा का ही हिस्सा है।
अहिंसा कायरता नहीं, वीरों का आभूषण है
लेखक ने महावीर के दर्शन के एक महत्वपूर्ण पहलू 'विरोधी हिंसा' को स्पष्ट किया है।
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वीरता बनाम कायरता: यदि राष्ट्र, धर्म या परिवार की अस्मिता पर संकट आए, तो उसका वीरता से मुकाबला करना कायरतापूर्ण पलायन से श्रेष्ठ है। दुष्टों के सामने घुटने टेकना अहिंसा नहीं, बल्कि कायरता है।
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अहिंसा परमो धर्म: महावीर का संदेश स्पष्ट था कि अहिंसा वीरों का गुण है। यह आत्मिक शक्ति का प्रतीक है, न कि दुर्बलता का।
अपरिग्रह और अनेकांत: शांति के आधुनिक अस्त्र
आज जब राष्ट्र संसाधनों पर कब्जे के लिए युद्धरत हैं, तब महावीर के दो अन्य सिद्धांत वैश्विक शांति की कुंजी बन सकते हैं:
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अपरिग्रह: अनावश्यक संचय की प्रवृत्ति का त्याग। यदि राष्ट्र अपनी विस्तारवादी नीतियों और संसाधनों की भूख को कम करें, तो संघर्ष स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
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अनेकांत: दूसरों के विचारों और दृष्टिकोणों का सम्मान करना। यदि विश्व शक्तियां आपसी वार्ता और एक-दूसरे के पक्ष को समझने (अनेकांतवाद) का प्रयास करें, तो युद्ध की विभीषिका को टाला जा सकता है।
वर्तमान वैश्विक संकट केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि नैतिक चेतना से सुलझ सकता है। 'जियो और जीने दो' का सिद्धांत मात्र एक नारा नहीं, बल्कि मानवता को बचाने का अंतिम विकल्प है। भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपनाकर ही विश्व को बारूद के ढेर से हटाकर शांति के पथ पर लाया जा सकता है।

