संपूर्ण विश्व में है नदियों में स्नान की परम्परा

There is a tradition of bathing in rivers all over the world.
 
संपूर्ण विश्व में है नदियों में स्नान की परम्परा
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)
भारत में नदियों के खुले घाटों पर स्नान की परंपरा अत्यन्त प्राचीन, व्यापक और गहरी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई है। मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर देश के कोने-कोने में लाखों श्रद्धालु नदियों में स्नान करते हैं। यहाँ नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि देवी, मातृशक्ति और जीवन-दायिनी के रूप में प्रतिष्ठित है। नदी में डुबकी लगाना शरीर की शुद्धि के साथ-साथ आत्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक शुद्धि का भी प्रतीक माना जाता है।

गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी जैसी नदियों के तटों पर बसे नगरों और कस्बों में प्रातःकालीन स्नान, संध्या-आरती, दीपदान, श्राद्ध, पिंडदान तथा व्रत-उपवास से जुड़े कर्मकांड एक जीवंत घाट-संस्कृति का निर्माण करते हैं। यह संस्कृति भारत की सामूहिक स्मृति और धार्मिक जीवन का केन्द्रीय अंग रही है।नदी-स्नान को आज भी पाप-पुण्य, कर्मफल और मोक्ष की अवधारणा से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि विशेष तिथियों, पर्वों या योगों में नदी-स्नान से पापों का क्षय और पुण्य की वृद्धि होती है। इसी कारण मकर संक्रांति, पूर्णिमा, अमावस्या और कुंभ जैसे अवसरों पर करोड़ों लोग दूर-दूर से आकर आस्था की डुबकी लगाते हैं। स्नान के अपने नियम, मर्यादाएँ और सावधानियाँ हैं—जल में प्रवेश की विधि, आचमन, संकल्प और आचरण—जो नदी-स्नान को साधारण शारीरिक क्रिया न बनाकर एक पूर्ण धार्मिक अनुष्ठान का स्वरूप देते हैं।
यदि इस भारतीय परंपरा की तुलना विदेशों से की जाए तो अंतर स्पष्ट हो जाता है। अन्य देशों में भी नदियाँ जीवन और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, किंतु वहाँ की नदी-संस्कृति का स्वरूप भिन्न है। यूरोप के जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में नदी-तटों पर सार्वजनिक स्नान और तैराकी की समृद्ध परंपरा है, पर इसका उद्देश्य धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और मनोरंजन से जुड़ा है। गर्मियों में राइन और एरे जैसी नदियों के किनारे “रिवर पूल”, “रिवर बीच” और सुव्यवस्थित तैराकी क्षेत्र विकसित किए जाते हैं, जहाँ लोग परिवार सहित समय बिताते हैं।
यहाँ सुरक्षा, स्वच्छता, लाइफगार्ड और चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएँ शहरी निकायों द्वारा सुनिश्चित की जाती हैं। Beebebइतिहास में झाँकें तो यूरोप की स्नान-संस्कृति का एक अलग रूप भी दिखाई देता है। प्राचीन रोम के सार्वजनिक स्नानागार सामाजिक मेल-मिलाप, स्वास्थ्य-संरक्षण और विश्राम के केंद्र हुआ करते थे। वहाँ नदी या झरनों से लाया गया जल उपयोग में तो आता था, किंतु उसे किसी धार्मिक पुण्य-प्राप्ति से नहीं जोड़ा गया। आगे चलकर यूरोप और मध्य एशिया में विकसित हम्माम, स्पा और गर्म जल-स्रोतों की संस्कृति भी चिकित्सा, आराम और सौंदर्य-बोध से अधिक संबंधित रही।
धार्मिक दृष्टि से वैश्विक संदर्भ में ईसाई परंपरा का ‘बपतिस्मा’ उल्लेखनीय है। इसमें बहते जल—कभी नदी या झील—में डुबकी देकर या जल छिड़ककर व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध माना जाता है। आज भी कई ईसाई समुदाय खुले जलाशयों में सामूहिक बपतिस्मा करते हैं, किंतु यह रोज़मर्रा की क्रिया न होकर एक विशेष संस्कार है। इसी प्रकार ठंडे देशों में पर्व-विशेष पर बर्फीली नदियों या झीलों में डुबकी लगाने की परंपरा भी है, जिसे धार्मिक से अधिक साहसिक या स्वास्थ्य-संबंधी गतिविधि माना जाता है।
अमेरिका में भी नदियों में नहाने और तैरने के अनेक स्थल हैं, पर उनकी प्रकृति भारतीय घाट-संस्कृति से भिन्न है। मिसिसिपी, कोलोराडो, पोटोमैक और हडसन जैसी नदियों के तटों पर “रिवर बीच” और मनोरंजन स्थल विकसित किए गए हैं, जहाँ लोग तैराकी, नौकाविहार, पिकनिक और मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों का आनंद लेते हैं। छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवार सहित नदी-स्नान लोक-संस्कृति का हिस्सा है, पर इसे धार्मिक कर्तव्य या पाप-पुण्य से नहीं जोड़ा जाता।
अमेरिका में नदी-जल से जुड़ा धार्मिक पक्ष मुख्यतः बपतिस्मा जैसे संस्कारों तक सीमित है। इसके अतिरिक्त “पोलर प्लंज” जैसी परंपराएँ नए वर्ष या चैरिटी आयोजनों से जुड़ी होती हैं, जो आधुनिक, उत्सवधर्मी जीवन-शैली का प्रतीक हैं।
इस प्रकार भारत और विदेशों की नदी-संस्कृतियों के बीच मूल अंतर उनके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आशयों में निहित है। भारत में नदी-स्नान आस्था, अध्यात्म, कर्म और मोक्ष से जुड़ा है, जिससे घाट, आरती, मंत्रोच्चार और उत्सवों की एक समृद्ध प्रतीक-प्रणाली विकसित हुई है। वहीं यूरोप और अमेरिका में नदी मुख्यतः प्राकृतिक संसाधन, शहरी जीवन-रेखा और मनोरंजन का माध्यम है।
भारतीय नदियाँ केवल भूगोल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मानचित्र का केन्द्र हैं। जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक, जीवन के लगभग हर पड़ाव में नदी किसी न किसी रूप में जुड़ी रहती है। इसके विपरीत, विदेशों में नदी से संबंध अधिकतर लौकिक, व्यावहारिक और मनोरंजनपरक दिखाई देता है। यही अंतर भारतीय घाट-संस्कृति को वैश्विक परिदृश्य में एक विशिष्ट और अद्वितीय पहचान देता है।
विडंबना यह है कि जहाँ भारतीय नदियाँ आज प्रदूषण का शिकार हैं, वहीं विदेशों में नदियों की पूजा भले न होती हो, पर वे अपेक्षाकृत स्वच्छ और संरक्षित हैं।

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