यह पृथ्वी हमारी मां है: प्रोफेसर उपमा चतुर्वेदी

This Earth is our mother: Professor Upma Chaturvedi
 
यह पृथ्वी हमारी मां है: प्रोफेसर उपमा चतुर्वेदी

लखनऊ, 28 फरवरी 2026। “यदि हम इस पृथ्वी को अपनी मां मान लें, तो न सार्वजनिक स्थानों पर थूकेंगे, न कूड़ा फैलाएंगे और न ही प्लास्टिक से पर्यावरण को प्रदूषित करेंगे।” यह प्रेरक संदेश अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज, लखनऊ की प्रोफेसर उपमा चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर दिया।

श्री जय नारायण मिश्र (केकेसी) महाविद्यालय में भूगोल एवं भू-विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की मुख्य थीम “सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण” रही।

कार्यक्रम का शुभारंभ कला संकाय प्रभारी एस.सी. हजेला, विज्ञान संकाय प्रभारी एस.पी. शुक्ला एवं भूविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अंशुमाली शर्मा ने मुख्य वक्ता को पौधा भेंट कर किया।

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मुख्य वक्ता प्रोफेसर उपमा चतुर्वेदी ने विद्यार्थियों को सतत विकास के 17 एसडीजी लक्ष्यों से परिचित कराते हुए पर्यावरण संरक्षण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विकास तभी सार्थक है, जब वह प्रकृति के संतुलन के साथ हो। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने अपनी कविता “अधूरा कैनवास” का पाठ किया,

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जिसमें जैव विविधता, पर्यावरण संतुलन और जिम्मेदार नागरिकता का संदेश निहित था।कार्यक्रम में छात्राओं ने संवाद-नाटिका के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की रूपरेखा प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की। इस अवसर पर “विकसित भारत” विषयक पोस्टर प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया।

  • प्रथम पुरस्कार: तमन्ना चौहान

  • द्वितीय पुरस्कार: अंकुश कुमार प्रसाद

  • तृतीय पुरस्कार (संयुक्त): तनीषा सिंह एवं रुद्र प्रताप सिंह
    अन्य प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार भी प्रदान किए गए।

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कार्यक्रम के अंत में भूगोल विभाग प्रभारी श्री आदित्य काला ने सभी को शुभकामनाएं दीं। प्राचार्य प्रोफेसर के.के. शुक्ला ने भी आयोजन के लिए विभागों को बधाई संदेश प्रेषित किया।इस अवसर पर वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आर.के. पांडे, प्रोफेसर विवेक सिंह, डॉ. नरेंद्र शंकर पांडे, डॉ. आशुतोष शुक्ल, सुश्री आयुषी शर्मा सहित अनेक शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का यह आयोजन विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच, पर्यावरणीय चेतना और जिम्मेदार नागरिकता के संस्कार विकसित करने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुआ।

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