विचार: मानसून और भारतीय अर्थव्यवस्था! जानिए मानसून की उत्पत्ति का विज्ञान और देश की समृद्धि में इसका महत्व
(सुभाष आनंद के विचारों पर आधारित विशेष आलेख)
Indian Monsoon and Economy: "भारतीय कृषि मानसून के साथ खेला जाने वाला एक जुआ है"—यह कहावत सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में जहाँ कृषि क्षेत्र आजीविका का मुख्य आधार है, वहाँ मानसून केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की धड़कन है।
जून से सितंबर के बीच हिंद महासागर से उठने वाली मानसूनी हवाएँ जब भारतीय उपमहाद्वीप में बरसती हैं, तो वे न केवल नदियों और जलाशयों को पानी से भरती हैं, बल्कि देश की आर्थिक समृद्धि का आधार भी तैयार करती हैं।
मानसून की उत्पत्ति के पीछे का विज्ञान
मानसून की उत्पत्ति का मूल कारण जल और थल पर सौर ऊर्जा (सूर्य की किरणों) का अलग-अलग प्रभाव और उनकी 'ऊष्मा धारिता' (Heat Capacity) में अंतर है।
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थल का तेजी से गर्म होना: मिट्टी और भूमि की बनावट के कारण सौर ऊर्जा केवल कुछ सेंटीमीटर गहराई तक ही जा पाती है। इस वजह से भूमि और उसके ऊपर की हवा बहुत तेजी से गर्म हो जाती है।
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समुद्र का धीरे गर्म होना: इसके विपरीत, पानी में सूर्य की किरणें गहराई तक प्रवेश करती हैं और जल की ऊष्मा धारिता मिट्टी से अधिक होती है। परिणाम स्वरूप, समुद्र का पानी थल की तुलना में देर से गर्म होता है और ठंडा होने में भी अधिक समय लेता है।
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हवा का दबाव और बहाव: ग्रीष्म ऋतु में जब भारतीय उपमहाद्वीप (विशेषकर तिब्बत का पठार और उत्तर-पश्चिम भारत) की भूमि अत्यधिक गर्म होकर निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बनाती है, तो हिंद महासागर से ठंडी और नमी युक्त हवाएँ (High Pressure) भूमि की ओर बहने लगती हैं। यही हवाएँ दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में भारत में वर्षा करती हैं।
ग्रीष्मकालीन बनाम शीतकालीन मानसून
भारत मुख्य रूप से दो प्रकार की मानसूनी हवाओं का अनुभव करता है:
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दक्षिण-पश्चिम (ग्रीष्मकालीन) मानसून: यह जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है। यह भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करता है।
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उत्तर-पूर्वी (शीतकालीन) मानसून: इसे लौटता हुआ मानसून भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भारत के दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों (विशेषकर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश) में बारिश करता है। शीतकालीन मानसूनी बारिश लगातार न होकर झोकों (Spells) के रूप में होती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में मानसून की भूमिका
भारत में 100 से 125 दिनों की मानसूनी अवधि देश की दिशा और दशा तय करती है:
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कृषि और ग्रामीण मांग: देश की 50 प्रतिशत से अधिक कृषि योग्य भूमि आज भी सिंचाई के लिए सीधे तौर पर मानसूनी बारिश पर निर्भर है। एक अच्छा मानसून धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी खरीफ फसलों की बंपर पैदावार सुनिश्चित करता है।
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महंगाई पर नियंत्रण: मानसून सही समय पर और पर्याप्त होने से खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बनी रहती है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) नियंत्रण में रहती है।
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जल निकाय और बिजली उत्पादन: मानसूनी बारिश देश के प्रमुख जलाशयों और नदियों के जलस्तर को बढ़ाती है, जो न केवल रबी फसलों (जैसे गेहूं) की सिंचाई में काम आता है बल्कि जलविद्युत (Hydroelectric Power) उत्पादन को भी गति देता है।
यद्यपि आधुनिक उपग्रहों, रॉकेट और मौसम विज्ञान के उन्नत साधनों के माध्यम से मानसून के पूर्वानुमान में काफी सुधार हुआ है, लेकिन प्रकृति के इस अद्भुत चक्र की अनिश्चितता आज भी बनी हुई है। मानसून का हर एक कतरा भारत के किसानों के चेहरों पर मुस्कान और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

