पुरुष नहीं, समय होता है बलवान: बदल गया शिवराज सिंह चौहान का वक्त

कोसमी में आदिवासी परिवारों के मकान टूटने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री को धरने पर बैठना पड़ा, कभी जिनके इशारे पर सक्रिय हो जाता था प्रशासन, अब उसी से कार्रवाई रुकवाने के लिए करनी पड़ी अपील

 
SDFS

लेखक: पवन वर्मा | विनायक फीचर्स

एक प्रसिद्ध कहावत है— “पुरुष बलवान नहीं होता, समय बलवान होता है। भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन, वही बाण।” यह कहावत बताती है कि परिस्थितियां बदलते ही बड़े से बड़े पराक्रमी व्यक्ति की शक्ति और प्रभाव भी सीमित हो सकते हैं।

महाभारत के प्रसंग के अनुसार, युद्ध के बाद जब अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की पटरानियों को द्वारका से हस्तिनापुर लेकर जा रहे थे, तब रास्ते में भीलों ने उन पर हमला कर दिया और गोपियों को अपने साथ ले गए। वही अर्जुन, जिनके गांडीव और पराक्रम के सामने बड़े-बड़े योद्धा टिक नहीं पाते थे, परिस्थितियां बदलने पर असहाय नजर आए। उनके पास वही गांडीव था और वही भुजाओं का बल, लेकिन समय और परिस्थितियां बदल चुकी थीं।

मध्य प्रदेश की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ हालिया घटनाक्रम को भी इसी कहावत के संदर्भ में देखा जा रहा है। कभी उनके एक इशारे पर पूरा प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हो जाता था। अधिकारियों की नियुक्तियों से लेकर विकास कार्यों तक, प्रदेश की राजनीति में उनकी बात का खास महत्व था। सत्ता और संगठन, दोनों में उनका प्रभाव दिखाई देता था। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी छूटने के बाद मध्य प्रदेश की सत्ता में उनका पुराना प्रभाव कितना कायम है, यह सवाल अब चर्चा में है।

कोसमी की घटना ने बदले राजनीतिक समीकरणों की ओर खींचा ध्यान

सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने की घटना ने इस चर्चा को और तेज कर दिया। वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के मकान तोड़ दिए गए। साथ ही, उनके एक कुएं को भी मिट्टी से भर दिया गया।

घटना की जानकारी मिलने पर शिवराज सिंह चौहान रविवार, 11 अक्टूबर को कोसमी गांव पहुंचे। प्रभावित परिवारों की स्थिति देखने के बाद उन्होंने नाराजगी जताई और कार्रवाई में हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने प्रदेश के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से भी बात की।

हालांकि, तत्काल अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद शिवराज सिंह चौहान को प्रभावित आदिवासी परिवारों के साथ धरने पर बैठना पड़ा। यही घटनाक्रम इस सवाल का आधार बना कि कभी जिस प्रशासनिक व्यवस्था में उनके निर्देशों को विशेष महत्व मिलता था, उसी व्यवस्था की कार्रवाई रुकवाने के लिए उन्हें अब सार्वजनिक रूप से विरोध क्यों करना पड़ा।

बुधनी: राजनीतिक सफर का मजबूत आधार

शिवराज सिंह चौहान का बुधनी से गहरा राजनीतिक और भावनात्मक जुड़ाव रहा है। वे सीहोर जिले के जैत गांव के रहने वाले हैं। बुधनी क्षेत्र ने उन्हें विधानसभा की राजनीति में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर वे विदिशा संसदीय क्षेत्र से सांसद बने और फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लंबे समय तक सत्ता संभाली।

मुख्यमंत्री रहते हुए बुधनी उनका मजबूत राजनीतिक आधार बना रहा। क्षेत्र में उनका जनसंपर्क और समर्थकों के बीच उनकी पकड़ उनकी राजनीतिक ताकत का अहम हिस्सा रहे। ऐसे में इसी क्षेत्र के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के साथ हुई कार्रवाई के विरोध में उनका धरने पर बैठना राजनीतिक दृष्टि से भी चर्चा का विषय बन गया।

मुख्यमंत्री रहते हुए प्रशासन पर था प्रभाव

नवंबर 2005 से दिसंबर 2018 तक और फिर मार्च 2020 से दिसंबर 2023 तक शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस लंबे कार्यकाल में उन्होंने अपनी एक अलग प्रशासनिक और राजनीतिक शैली विकसित की।

सड़क, बिजली, पानी, सिंचाई या अन्य जनसमस्याओं से जुड़े मामलों में उनके निर्देशों के बाद संबंधित विभागों में तेजी से गतिविधियां शुरू होने की छवि बनी। भाजपा संगठन और राज्य सरकार में भी उनका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था।

लेकिन सत्ता से हटने के बाद किसी भी नेता के सामने यह चुनौती रहती है कि उसका व्यक्तिगत प्रभाव प्रशासनिक व्यवस्था में किस हद तक कायम रहता है। मुख्यमंत्री का पद केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा नहीं देता, बल्कि उसके साथ निर्णय लेने और सरकारी तंत्र को निर्देशित करने की संस्थागत शक्ति भी जुड़ी होती है। पद बदलने पर प्रभाव के स्वरूप में बदलाव आना स्वाभाविक है।

केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद सामने आई चुनौती

दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद शिवराज सिंह चौहान को केंद्र सरकार में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी मिली। राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में उनकी पहचान आज भी महत्वपूर्ण है। फिर भी, कोसमी की घटना ने यह अंतर उजागर किया कि केंद्रीय मंत्री के रूप में उनकी स्थिति और मध्य प्रदेश की राज्य सरकार पर उनके प्रत्यक्ष प्रभाव के बीच अंतर हो सकता है।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को केवल व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव में कमी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई, प्रभावित परिवारों के अधिकार और प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। किसी भी कार्रवाई में कानून का पालन करने के साथ प्रभावित लोगों की स्थिति और उनके साथ हुए व्यवहार पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

मुलाकात के बाद मामले का पटाक्षेप

घटनाक्रम के बाद शिवराज सिंह चौहान की मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से मुलाकात हुई। इसके बाद मामले का पटाक्षेप होने की बात सामने आई। हालांकि, इस प्रकरण ने सत्ता, संगठन और प्रशासन के बीच बदलते संबंधों को लेकर नई चर्चा जरूर छेड़ दी।

राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली रहने वाले नेताओं के लिए भी समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं। कभी जिस पद से फैसले लिए जाते थे, उससे हटने के बाद उसी तरह का प्रभाव बनाए रखना आसान नहीं होता। शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक सफर में कोसमी की घटना इसी वास्तविकता की याद दिलाती है।

आखिरकार, कहावत का सार यही है कि व्यक्ति का पराक्रम, पद और प्रतिष्ठा अपनी जगह हैं, लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलती रहती हैं। व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, समय से बड़ा कोई नहीं होता।

#शिवराजसिंहचौहान #मध्यप्रदेशराजनीति #बुधनी #कोसमी #आदिवासीपरिवार #मोहनयादव #भाजपा #राजनीतिकविश्लेषण #विनायकफीचर्स

Tags