शीर्षक: उत्तर प्रदेश के ‘विकास मॉडल’ पर उठते सवाल: इंजीनियरिंग और जवाबदेही दोनों कटघरे में
(ओंकारेश्वर पांडेय – विनायक फीचर्स)
उत्तर प्रदेश में बीते कुछ वर्षों में ‘विकास मॉडल’ को तेज़ रफ्तार और बड़े प्रोजेक्ट्स के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इसकी गुणवत्ता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। राजधानी लखनऊ के गोमती नगर में करोड़ों रुपये की लागत से बने ग्रीन कॉरिडोर का उद्घाटन के कुछ ही समय बाद धंस जाना इस मॉडल की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है। यह घटना केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि निर्माण प्रक्रियाओं और निगरानी तंत्र पर गहरी चिंता पैदा करती है।
बताया गया कि सड़क धंसने की वजह पुरानी सीवर लाइन का रिसाव था, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार इसकी जानकारी पहले से थी। इसके बावजूद समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या परियोजनाओं में गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है या नहीं।
सड़क सुरक्षा के आंकड़े भी स्थिति को गंभीर बनाते हैं। हाल के वर्षों में गड्ढों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है, जो बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब राज्य को ‘एक्सप्रेसवे प्रदेश’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
निर्माण कार्यों की गति को लेकर भी तुलना सामने आती है। विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में सड़क निर्माण की औसत रफ्तार लगभग समान रही है, लेकिन गुणवत्ता को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल निर्माण की गति ही नहीं, बल्कि टिकाऊपन और सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
लागत के मामले में भी कई परियोजनाओं में अपेक्षा से अधिक खर्च सामने आया है। ऑडिट रिपोर्ट्स में यह संकेत मिला है कि कई बार योजनाएं बिना दीर्घकालिक योजना के स्वीकृत होती हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है। इससे पारदर्शिता और वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठते हैं।
शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी सड़कों की स्थिति संतोषजनक नहीं मानी जा रही है। कई स्थानों पर नई बनी सड़कों के खराब होने की शिकायतें सामने आई हैं, जो निर्माण गुणवत्ता की ओर इशारा करती हैं।
विकास के नाम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा और उद्घाटन तो हो रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि टिकाऊ विकास के लिए केवल प्रतीकात्मक परियोजनाओं के बजाय मजबूत आधारभूत ढांचे और जवाबदेही पर ध्यान देना होगा।
अंततः, यह स्पष्ट है कि विकास केवल आंकड़ों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि मजबूत और सुरक्षित बुनियादी ढांचे से मापा जाता है। उत्तर प्रदेश के लिए यह समय आत्ममंथन का है, जहां पारदर्शिता, गुणवत्ता और जवाबदेही को प्राथमिकता देकर ही वास्तविक विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
