आज मौसम बड़ा बेईमान है: चुनावी हवाओं ने बदल दिए सियासत के मिजाज़

Today the weather is very dishonest: election winds changed the mood of politics
 
Today the weather is very dishonest: election winds changed the mood of politics

लेखक: सुधाकर आशावादी (विनायक फीचर्स)

आज मौसम बड़ा बेईमान है...

जी हां, आजकल का प्राकृतिक मौसम तो बेईमान है ही, जो कभी बिना बादल बरस जाता है तो कभी गर्मी में शिमला सा अहसास करा देता है। लेकिन प्राकृतिक मौसम से भी कहीं अधिक 'बेईमान' और दिलचस्प होता है राजनीतिक मौसम

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों ने राजनीतिक मौसम विज्ञानियों (एग्जिट पोल और विश्लेषकों) के सारे कयासों को धता बता दिया। जिन्हें गुमान था कि मौसम उनकी मुट्ठी में है, उनके लिए वह यकायक 'बेवफा' हो गया। मौसम तो अपनी मर्जी का मालिक है; उसने तनिक भी नहीं सोचा कि वह किसके अनुकूल चल रहा था। परिणाम आते ही कुछ के लिए वादियों सी ठंडक हो गई, तो कुछ के लिए यह तपती धूप जैसा रुदन का कारण बन गया।

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रुदालियों का प्रवेश

जैसे ही चुनावी परिणाम उम्मीदों के विपरीत आए, रुदालियां सड़कों पर उतर आईं। ये रुदालियां—जो हार के मातम को अपनी आजीविका और विलाप को अपना पेशा बना चुकी हैं—मौसम को गालियां देने लगीं। उनका जन्म ही रुदन के लिए हुआ है, उन्हें किसी की खुशी सहन नहीं होती।रुदालियों बेचारी करती भी तो क्या करतीं। उन्हें किसी के दुख में रुदन के लिए ही पैसे मिलते हैं। यदि उनका रुदन अभ्यास समाप्त हो गया, तो इसका प्रतिकूल असर उनके व्यवसाय पर पड़ना स्वाभाविक है।"

पेशेवर रुदन और सोशल मीडिया

हैरानी की बात यह है कि इनमें से कुछ रुदालियां ऐसी भी हैं, जिन्हें किसी की जीत या हार से कोई वास्तविक सरोकार नहीं होता। उनके लिए सातों दिन एक जैसे रहते हैं। रुदन उनके लिए महज एक औपचारिकता है। जब भी चुनाव परिणाम आते हैं, रुदालियां सड़कों से लेकर सोशल मीडिया के मंचों तक अपने 'विशेष एपिसोड' दिखाना शुरू कर देती हैं।

चाहे कोई हारे या जीते, इन रुदालियों के लिए 'रुदन का मौसम' बार-बार आता है। इसे आप उनके धंधे के प्रति समर्पण कह सकते हैं या उनकी वफादारी भरी मजबूरी। हर चुनाव के बाद यही कहानी दोहराई जाती है—वही आंसू, वही विलाप और वही चुनावी मौसम की बेईमानी का रोना।

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